Monday, March 21, 2011

जीवन की सच्चाई

जीवन को
मौत के शिकंजे से
आज़ाद करवाना है
अवसर है यही
जानती हूँ, पर पहचानती नहीं
उस सच को , जो
निरंतर कहता है
"जीवन पाना है, तो
विष को पीना होगा"

विष!
विष तो जीवन को मार देगा
जीवन दान कैसे दे सकता है?
वह जो खुद कड़वाहटों का प्याला है
अम्रत कैसे बन सकता है?

अविश्वास में मैं जीती हूँ
अविश्वास में मैं मरती हूँ
गर यही जीवन है
तो इस बार
इस बार उस सत्य को
जो निरंतर कहता है
"जीवन पाना है, तो
विष को पीना होगा"
उस सत्य पर विश्वास करके
मेरे अंदर के
सारे अविश्वास मिटाना चाहती हूँ.

शायद इस जीवन को जीते जीते
मैं जान गई हूँ
कि मैं उस विष को पिये बिना
जीवित नहीं रह सकती

देवी नागरानी

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