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Thursday, October 23, 2014

उत्पादन का ज़माना


अर्थ शास्त्र का अर्थ है उत्पादन

सभी को उत्पादक होना है

वर्ना फिज़ूल है अस्तित्व !

 

समय से समय निकालकर

इन फिज़ूल अस्तित्व वालों को समय देना

फिज़ूल ख़र्ची मानी जाती है,  

समय का सदुपयोग है उत्पादन में

जहां संसार भर की सुविधाएं

उपलब्ध हों, लेकिन

उनका भोग करने के लिए

किसी के पास समय न हो!

 

यह कैसा अर्थशास्त्र है

जिसके अर्थों में

अनर्थों की संभावना पनप रही है।

 

परिवार नाम की संस्था की

नींव रखने वाले निर्वासित हो रहे हैं

ऐसे में घरों में सन्नाटा बस गया है

बूढ़े कहीं दिखाई नहीं देते!

 

जवानी की दहलीज़ पार करते ही

एक अवस्था आती है जीवन में

जहां आदमी न जवान रहता है, न बूढ़ा

यह उसी समय की व्यथा है-उत्पादन का न होना ।

 

जवान बड़े होते हैं,

बूढ़ों को बूढ़ा होने के पहले, बूढ़ा करार किया जाता है

उनका सुख, चैन,

समय गँवाने के पहले,  नौजवान,

उनके लिए स्थापित किए गए

वृद्धाश्रम में उन्हें छोड़ आते हैं,

वहीं,

जहां उन्हें अपना कल महफ़ूज नज़र आता है।

 

अब सोचिए,

नव पीढ़ी के इस सोच का आविष्कार

क्या क्या न देगा

आने वाके कल के वारिसों को

जब घर में बूढ़े न होंगे?

 

कौन सुनाएगा उन बच्चों को

तोता मैना की कहानी

वे लोरियां, जो

सपनों के संसार से उन्हें जोड़ती हैं,

वो बचपन के किस्से... वो बाबा की बातें....

घर आँगन में तुलसी का रोपना...

गायत्री मंत्र का पाठ, और...

हनुमान चालीसा का दोहराया जाना ...

 

सभी कुछ तो छूट जाएगा

समय की तंग गलियों में खो जाएगा

और ऐसे संकीर्ण जीवन के सूत्रों से जुड़कर

आदमी असमय ही,

जीवन जीने के पहले बूढ़ा हो जाएगा।

पर,

क्या कर सकता है कोई

उत्पादन के ज़माने में?

यह वक़्त की मांग है

अपने ही स्थापित किए हुए वृद्धाश्रमों में

उन्हें जाना होगा......

आश्रय लेना होगा !

Wednesday, May 7, 2014

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे


ग़ज़ल

कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे

जाने क्या था उसे गिला मुझसे

चंद साँसों की देके मुहलत यूँ

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे

क्या लकीरों की कोई साज़िश थी

रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे

जो भरोसे को मेरे छलता है

वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे

शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो

कह गई अपना हर गिला मुझसे

ऐब मेरे गिना दिये जिसने

दोस्त बनकर गले मिला मुझसे

जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको

ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे

माँ ने कहा था


माँ ने कहा था

मैं गाड़ी के नीचे आते आते

बच गई थी !

तब मैं छोटी थी....

और

माँ ने ये भी कहा था

आने वाले कल में

ऐसे कई हादसों से

मैं खुद को बचा लूँगी

जब मैं बड़ी हो जाऊँगी.....

पर

कहाँ बचा पाई मैं खुद को

उस हादसे से?

दानवता के उस षड्यंत्र से?

जिसने छल से

मेरे तन को, मेरे मन को

समझकर एक खिलौना

खेलकर, तोड़-मरोड़ कर

फेंक दिया उसे वहाँ,

जहां कोई रद्दी भी नहीं फेंकता !

 

उफ़ !

बीमार मानसिकता का शिकार

वह खुद भी,

ज़िन्दा रहने का सबब ढूँढता है !

सच तो यह है

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं !

 

याद आया

माँ ने ये भी कहा था

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं !

Wednesday, January 8, 2014

Kuch n Kahkar By Rafique Sheikh

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किस बात का डर

आँखें बंद है मेरी तीरगी से लिपटा हुआ मेरा यह मन, गहरे बहुत, गहरे धंसता चला जाता है अपने ही भीतर की खाइयों में, आखिर थक हार कर जब, मैं बेबसी में खुद को छोड़ देती हूँ, तब लगता है मुझे मैं रोशनी से घिर जाती हूँ , फिर मुझे डर नहीं लगता न जाने किस बात का डर पाल लिया था मैंने खुद से भी कोई डरता है क्या? अब मुझे डर नहीं लगता । देवी नागरानी

Thursday, December 19, 2013

Bezubaan Cheekhein


“दिल धड़क उठा, तब

जब,

दिल दहलाती चीख गूंज उठी

यहीं कहीं, आस-पास

अपने ही भीतर, और

बेसदा सी वह आवाज़

घुटती रही, घुटती रही

पर

मैं कुछ न कर सकी !

“दिल सिसक उठा, तब 

जब, जाना

काले बादलों की क़बा भी

उसकी अंग-रक्षक न बन पाई

बेनाम, बेनंग आदम हमशरीक़ रहे

उस गुनाह में

जिसकी सज़ा आज

मानवता के सर पर

तलवार बन कर लटक रही है

बाखुदा! उस सज़ा में

नारी का रुआं रुआं हाज़िरी भर रहा है

आज भी, अभी भी, इस पल भी

पर कोई कुछ नहीं कर रहा!!

“दिल रोता है

जब आँखें देखती हैं

बेधड़क, बेझिझक घूमती बेहयाई

दिशाहीन वे दरिंदे, साज़िशी गिद्ध बनकर

पाकीज़गी को चीर-फाड़ रहे हैं।

जख्मी जिस्म से निकलती

तेज़ नुकीली चीखें

इन्सानियत की ख़ला में

अपने लाचार पंजे गाढ़ रही है

इस उम्मीद में, हाँ इस उम्मीद में, कि 

कोई तो एक होगा

मानवता का अंगरक्षक

जो इन लाखों आवाज़ों के बीच

सुनकर दिल दहलाती वह चीख 

एक उजड़ती ज़िंदगी को बचा पाये।

पर हर आस

बेआस होकर लौट रही है 

और

कोई कुछ नहीं कर पा रहा है!

आज भी चीखें

लटक रही हैं फ़ज़ाओं में

आज भी कासा-ए-बदन

भिखारी की तरह                                                                           मांग रहा है

अपने ही भाई-बेटों से

अपनी बेलिबास क़ज़ा के लिए

एक लजा का कफ़न !

इस आस में, कि शायद

कोई कुछ कर सके!!

Monday, September 2, 2013

2010 सिन्धी "चेटी चाँद" के अवसर पर

 

दिनांक १३ मार्च, २०१० रविवार शाम ५.३० बजे आर.डी. नेशनल कॉलेज के ऑडिटोरियम में लायन क्लब ऑफ़ यूनिवर्सिटी काम्पस एवं लायन क्लब ऑफ़ बांद्रा के लायंस श्री अमर मंजाल एवं देवीदास सजनानी के सौजन्य से सिन्धी फिल्म "जय झूलेलाल" दर्शायी गई, वहां फिल्म के मुख्या कलाकार श्री मोहनलाल बेल्लानी(झूलेलाल), कुमार खिलनानी (मिर्ख बादशाह) , एवं रमेश करनानी (झूलेलाल के पिता) अवसर के प्रमुख महमान रहे.

सिन्धी नव वर्ष "चेटी चाँद" के अवसर पर फिल्म "जय झूलेलाल" का उद्घाटन उत्सव एवं देवी नागरानी के सिन्धी काव्य संग्रह "मैं सिंध की पैदाइश हूँ " का लोकार्पण !