Monday, March 21, 2011

यह पल

कल और आज के बीच का

यह पल मेरा है

और यही वह समय है

जिसमें मैं

उस सचाई से परिचित हुई हूँ

कि मैं वो नहीं

जो कुछ करती हूँ

करता कोई और है

मैं वो नहीं जो सुनती हूँ

सुनता कोई और है

मैं वो नहीं जो जीती हूँ

जीता कोई और है

मैं तो खुद को जीवित रखने के लिए

रोज़ मरती हूँ

देवी नागरानी

मैं कौन हूँ?

मैं वो कविता हूँ
जो कोई क़लम न लिख पाई
रात के सन्नाटों में
तन्हाइयों का शोर
ज्वालामुखी बन कर उबल पड़ा,
इक दर्द जो सदियों से
चट्टान बनकर मेरे भीतर जम गया था
वही पिघलकर
एक पारदर्शी लावा बनकर बह गया
जब मैं खाली हुई
तब जाकर जाना कि मैं कौन हूँ
देवी नागरानी

डर किस बात का

आँखें बंद है मेरी
तीरगी से लिपटा हुआ
ये मन, गहरे बहुत गहरे
धंसता चले जा रहा है.
जब
बेबसी में खुद को छोड़ दिया
तब लगा
मैं रोशनी से घिर गई हूँ
अब मुझे डर किस बात का !

देवी नागरानी

गुमराह न हो

आबला पा हुए हैं हम चलते चलते कल से आज तक के इस सफ़र में , जो मेरे बचपन को लेकर अब तक की मेरी जिंदगी को ज़ब्त कर चुका है ओर निश्चित है आज से आने वाले कल तक का सफ़र भी तय होगा शायद वो रिसते हुए छाले क़दम दर क़दम आगे और आगे बढ़ते रहें इस आशा में, कि मेरे पांव भटक कर संभल जाएं पर, कहीं गुमराह न हो!
देवी नागरानी

खुली किताब

सोच की सिलवटें
मेरी पेशानी पर तैरती है
और जैसे ही
वो गहरी हुई जाती हैं
एक उलझन बनकर
चहरे की झुर्रियों के साथ
तालमेल खाती
मेरे माथे पर एक छाप छोड़ जाती है
और उस वक़्त
एक खुली कि़ताब का सुफ़्आ
बन जाता है मेरा चहरा
जिसे, वक़्त के दायरे में
कोई भी पढ़ सकता है.
देवी नागरानी

जीवन की सच्चाई

जीवन को
मौत के शिकंजे से
आज़ाद करवाना है
अवसर है यही
जानती हूँ, पर पहचानती नहीं
उस सच को , जो
निरंतर कहता है
"जीवन पाना है, तो
विष को पीना होगा"

विष!
विष तो जीवन को मार देगा
जीवन दान कैसे दे सकता है?
वह जो खुद कड़वाहटों का प्याला है
अम्रत कैसे बन सकता है?

अविश्वास में मैं जीती हूँ
अविश्वास में मैं मरती हूँ
गर यही जीवन है
तो इस बार
इस बार उस सत्य को
जो निरंतर कहता है
"जीवन पाना है, तो
विष को पीना होगा"
उस सत्य पर विश्वास करके
मेरे अंदर के
सारे अविश्वास मिटाना चाहती हूँ.

शायद इस जीवन को जीते जीते
मैं जान गई हूँ
कि मैं उस विष को पिये बिना
जीवित नहीं रह सकती

देवी नागरानी

Sunday, March 20, 2011

होली मुबारक

झूमकर नाचकर गीत गाओ
सात रंगों से जीवन सजाओ

पर्व पावन है होली का आया
भाईचारे से इसको मनाओ

हर तरफ़ शबनमी नूर छलके
कहकशाँ को ज़मीं पर ले आओ

लाल, पीले, हरे, नीले चहरे
प्यार के रंग ऐसे मिलाओ

देवी चहरे हों रौशन सभी के
दीप आशाओं के यूँ जलाओ

देवी नागरानी

Sunday, March 6, 2011

मछली जल की रानी है

मछली जल की रानी है
जीवन उसका पानी है
हाथ लगाओ डर जायेगी
बाहर निकालो मर जायेगी
देवी नागरानी

एक कौआ प्यासा था

एक कौआ प्यासा था
जग में थोड़ा पानी था
कौआ डाला कँकर
पानी आया ऊपर
कौआ पिया पानी
ख़तम हो गई कहानी
देवी नागरानी

ऐ री बंदरिया मेरी

ऐ री बंदरिया मेरी
पूंछ कहाँ है तेरी
ढूँढ उसे यूँ बाहर भीतर
नींद उड़ी है मेरी
देवी नागरानी