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Monday, October 15, 2007

मेरा यश

मेरा यश
मन मोहक रूप मेरे यश का
बचपन की याद दिलाए है॥
मन की आशा उन आँखों में
रौशन इक दीप जलाए है॥
गोपी गोपी तन मन से सब
खुशियों से रास रचाए है॥
दीपक चुप चुप मुस्काये यूँ
ज्यूँ कुबेर खजाना पाए है॥
कोमल करुणामय दिव्य मधुर
ज्यों मेघ मल्हार सुनाए है॥
कविता लिखने में नशा ऐसा
खुशियाँ घर में जब आए हैं.
मुस्कान मेरे यश की देवी
मुरझाए फूल खिलाए है॥

1 comment:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इस सुंदर कविता के लिए बहुत बहुत बधाई।