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Sunday, October 21, 2007

विश्व हिंदी न्यास

विश्व हिंदी न्यास अधिवेशन २००७

हिंदी-दर्शन और दिशा

एक नये क्षितिज को छूता हुआ "विश्व हिंदी न्यास" द्वारा आयोजित अक्टूबर और तारीख,२००७ को सातवाँ अधिवेशन, अपने सभी इन्द्रधनुषी रंगों का एक बेजोड़, बेमिसाल अनुभव रहा. अनेकता में एकता हमारे हिंदुस्तान की पहचान है, इसी सत्य को अमली जामा पहना कर आयोजित किया गया यह अद्भुत प्रयास हमारी आनेवाली युवा पीढ़ी के लिये मार्गदर्शक है.
बाल साहित्य गोष्टी के अंतरगत हर उम्र के बच्चों ने भाग लिया, जिसका विस्तार कहानी, बाल गीत, विश्व गीत और नाटक के साथ साथ रोचक हकीकतों द्वारा देश की स्स्क्रुति को बखूबी अपने मूल्यों के साथ प्रसारित किया. भारत "विभन्नता में एकता" के एक सूत्र में पिरोया गया है, यह इस मंच पर झलकियों और झाँकियों की झिलमिलाहट में उज्वल और साफ़ नज़र रहा था. श्रीमती सीमा खुराना की आवाज़ में हकीकतों पर से परदे उठते चले गए. कलाकार एक के बाद एक शब्दों के परों पर सवार होकर मूक भाषा में अपने मन की भावनाओं की परिभाषा को व्यक्त करते रहे . बच्चे, बड़े विभिन्न पात्रों का रूप धारण करते हुए इस एकता का पैग़ाम पहुंचाने में सफल रहे, जिसके लिये उनकी जितनी तारीफ की जाये वह कम है.


उड़ीसा के न्रत्य, जगन्नाथ की रथ यात्रा का अद्भुत द्रश्य, राजस्थानी विवाह,जिसमें उनकी रस्में भी शामिल थीं, तामिलनाडू के तीज त्यौहार की झलकियाँ, पंजाब के परिवारों का संगठन और एकता उनके नाच-गाने, कढ़ाई-बुनाई और भाई चारे के द्रश्यों द्वारा मन को छूता चला गया. पंजाब का "गिद्धा" काबिले तारीफ़ था. एक मंच पर अनेक प्राँतों की शादियाँ, उनकी समानताओं और विपरीत रस्मों से वाकिफ़ कराती रही.

· उड़ीसा की शादी के निबंध जो द्रश्य सामने आए, वो हकीकत से ही जुड़े हुए थे और उसीसे वाकिफ़ कराया गया कि शादी सिर्फ़ दूल्हा दुल्हन के बीच नहीं होती, बल्कि दो परिवारों के बिच एक नया रिश्ता जुडने की रस्म भी है, जो जुड़ता है, पनपता है और उसी की छत्र छाया में आज इतना महफूज़ है.

· बंगला देश की शादी का द्रश्य बड़ा मन भावन था. शादी से बिदाई तक के द्रश्य किसी चलचित्र की झलकियों की तरह आँखों में समाते रहे.

· देश की महान हस्तियाँ ज़िंदा हो उठी उन कलाकार बच्चों के रुप में, जो देश से परे रहकर भी वहाँ की आदर्श भरी झलकियों को अपनी प्रस्तुतियों द्वारा उजगार कर पाए.

· "जलियनवाला बाग़" की अंधाधुंध गोलियों की बौछार का नमूना, भगतसिंह के "स्वतंत्रता संग्राम" के परिचय के साथ साथ उनका नारा " इन्कलाब जिंदाबाद" एक गूंज बनकर इस बात का आश्वासन दे रहे थे कि श्रँखलाओं में जकडी भारतमाता को ये वीर आज़ादी का जामा पहनाने में समर्थ हैं.

एक के बाद एकसुंदर सलोने चहरे सामने आते रहे. १४० कलाकारों की सजी धजी रूप रेखाएं मन पर अंकित सी हो गई. डाँडी मार्च के लिये तैयार गाँधीजी, सुभाषचंद्र बोस, श्री जवाहरलाल नेहरू.....!!

बस यूँ समझ लें कि इन कलाकरों ने रंग बिरंगी वेश भूषाओं में जीवित होकर इतिहास को दोहराया है, और उनकी सफलता से आँखे नम हुए बिना रह सकीं. सागर को गागर में समाने का यह अनूठा सफल प्रयास एवः अदभुत तजुर्बा रहा. कला प्रदर्शन देखकर लगता था जैसे यह एक संगठित परिवार है और उस मंच के कलाकार खुद भी उन रस्मों को निभाने के आदी हैं.

देवी नागरानी




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