Pages

Saturday, August 27, 2011

बहता रहा जो दर्द का सैलाब


ग़ज़ल


बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम

आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम

रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर

कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.

मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल

मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम

रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों

चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम

देवी नागरानी

No comments: