Tuesday, December 14, 2010

ये सागर पानी पानी है

ये सागर पानी पानी है
लहर हर इक कहानी है

लहर आए लहर जाए
अजब सी ये रवानी है

उमड़कर बाँध तोडे जो
उसे कहते जवानी है

जो समझे झूठ को है सच
वही दुनियाँ दिवानी है

क्षितिज के पार दुनियाँ इक
हमें भी तो बनानी है

तिलस्मि सारी ये दुनियाँ
यही क्या जिँदगानी है?
देवी नागरानी

2 comments:

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

बहुत ही प्यारे एहसाह भरे है इस कविता में....... सुंदर प्रस्तुति . दिल को छू लिए..

mridula pradhan said...

behad sunder bhaw.