मेरी जीवन यात्रा
उस पथिक जैसी है
जो ऊबड़ खाबड़ पगडंडियों पर
अपने सामने उन अदृश्य पद चिन्हों पर
चलते हुए विश्वास से क़दम बढ़ा रहा है
कि कोई उसका मार्गदर्शक है
जो उसके आगे चल रहा है
देवी नागरानी
जीवन एक यात्रा (विचार मंथन)
मैं मात्रा मिट्टी , वह भी
कच्ची
एक वही कुम्भार, जो मिटटी को सोना बना देता है
(करोना काल में आँखों के आगे रक्स करती
स्मृतियाँ-जो जाने किन खलाओं में धंस गई थीं, अब एक
एक करके सतह पर बिन बुलाये आ ही जाती है..शायद फिर से सांस लेकर इस काल के अंतिम
पहर के साथ घुल मिल जाने के लिए...)
कहते सुना है और
वक्त के साथ यह सच दोहराया भी जाता है-‘आत्मा
अमर है, शरीर एक आवरण है जो बदलता रहता है. अगर वह शरीर
मैं नहीं तो कौन है जिसका मैं आवरण हूँ? रूमी के दार्शनिक पहलुओं में कई जवाबों के बावजूद, अनेक सवाल फिर भी मंडराते
रहते हैं.
जीवन भी तो एक
यात्रा है, लंबी यात्रा, इस छोर से उस छोर तक. जिसमें पल्लवित होकर जीते हैं अहसास, भावनाएं, जज्बात, प्यार, दुलार, स्नेह के सौ-सौ स्वरूप. धीरे
धीरे सब बदल जाता है, मौसमों की तरह, बहारों से खिज़ां तक का सफर करते हुए सूखे चरमराए ज़मीन पर
पड़े पत्तों की तरह.
जीवन वाक़ई एक जंग है, ता-उम्र जूझना, लड़ना और अंत में ठहराव के पहले मौत की फतह का परचम फहराना. जन्म के वक्त पता ही
नहीं पड़ता कि जन्मदातिनी कौन है और मौत के समय पता नहीं पड़ता कि कब्र में किसने
लिटाया? जन्म पर किसने जश्न मनाया और
मौत पर किसकी रुदादी चीख उठी. तब माँ की शीतल कोख थी अब धरती माँ की ठंडी गोद नसीब
होती है.
अब जीवन को
माप-तोलकर जीना तो उसका अंत लाने जैसा है. क्या कभी हवाओं को बिना मरज़ी रुख बदलते
देखा है? जहां-जहाँ रुख हुआ, मुंह उठाकर चल दीं. आज मानवता भी हवाओं की मानिंद दिशाएं व्
दशाएं बदलती जा रही है.
साक्षात सच है तो बस ‘मौत’. आए दिन देखते हैं खुली आंखों से, सुनते है अपने ही कुनबे से, कितने जन सब छोड़-छाड़ कर चले गए, पर लगता है फिर भी
सब सपना सा है, भ्रम है जो टूटने का नाम नहीं लेता. अंत तक, जीने की लालसा हमारे हिस्से में है, मृत्यु औरों के लिए ! और तो और जब अपना कोई दिल से जुदा हो जाता है तो उनके जाने का गम हमें दिन रात
सालता है. घर में, दिल में एक खालीपन भर जाता है जिसे कभी कोई और
रिश्ता-नाता भर नहीं पाता.
जब गुलशन में रहते हुए सतरंगी सुमन मुरझा जाएं तो यकीनन
बागबाँ के दिल के किसी कोने में कुछ टूटता है. वह जो फूलों को औलाद की मानिंद सींचता है, कली से फूल बनते देखता है और उनका अंत देखिए! ज़ालिम वक़्त क्या कहर बरपा कर
जाता है? बावजूद इसके बाज़ारवाद का परचम
बुलंदियों पर फहराया जा रहा है. पुराने ज़माने के कथा किस्सों में रिश्तों के
निर्वाह निर्वाह का मापदंड जो भी था, आज के समय से और था, जिनकी गवाहियां साहित्य में दर्ज कहानियां व उपन्यास के अंश
देते हैं. सिन्धी साहित्य सेवी नारायण भारती जी की कहानी ‘दस्तावेज’ में किरदार को क्लेम के कागज़ रद्द करने पड़े, ताकि पैसे मिलने पर उस पार बसे हुए लोगों को फिर से उजड़ना
न पड़े. कहीं, किसी कारणवश वह बाल-बच्चों
वाला बंदा घर से बेघर न हो जाए. कागज़ फाड़ने का सबब एक ही था.’ घर जाएगा तो परिवार टूट जाएगा, बच्चे लावारिस हो जाएंगे.’ यह परिवार के संगठन को संगठित करने की सोच उस समय थी, इस समय तकाज़े कुछ और हैं, हकीक़तें कुछ और हैं. सब का बंटवारा होने लगा है. ‘बागबां’ फिल्म इसी आधार की एक हकीकी जीवन गाथा, आज हज़ारों घरों के ‘बागबाँ’ खुद निराधार होते चले जा रहे
हैं. उनके लिए जीते जी स्वर्ग धाम, वृद्धाश्रम, आनंदश्रम, अपना घर, नाम से विशेष आकर्षक स्थान बनाए जा रहे
हैं. आज की पीढ़ी अपनी औलाद का फर्ज़ तो पूरा कर सकती है, पर अपने माँ-बाप का कर्ज़ नहीं चुका पाती. बीच के फासले और
फसीलें इतनी लंबी और चौड़ी हो गई हैं कि उन्हें पीढियां फांद नहीं पाती. एक छत के
नीचे दो प्राणी अजनबियों की तरह रहते हैं.
यह भी इस जीवन यात्रा का एक दौर है, एक पड़ाव है. यादों के अंबार कई दिलों के तहखानों में दबे हैं. कुछ पल के लिए कभी कोई खिड़की
खुलती है तो कभी कोई. यादें जब सांसो में कुछ पल लहलहाने लगती हैं तो लगता है उन
यादों के पालने में फिर से जिंदगी झूला झुला रही है. हाँ
जीवन एक झूला ही तो है, जन्म से लेकर
अंतिम यात्रा तक का.
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