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Tuesday, June 7, 2011

अनकही यादें

मूक ज़ुबान


कुछ कहने की कोशिश में

फिर भी नाक़ाबिल रही

नहीं बयां कर पाई उन अहसासों को

जो उमड़ घुमड़ कर

यादों के सागर की तरह

उसकी प्यसी ज़ुबाँ के अधर तक आ तो जाते हैं

पर अधूरी सी भाषा में

वह अनकही दास्तां

बिना कहे, फिर मौन रह जाती है

यह बेबसी है उसके सिये हुऐ लबों की

जो आज़ादी के नाम पर

अब भी दहशतों की गुलामी में

जकड़े हुए हैं.

देवी नागरानी

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