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Tuesday, April 19, 2011

नया साल


नया साल आकर चला जाता है

पुराना साल

जाते जाते पुनः नए नए वादे कर जाता है

और फिर नया साल आता है!

अपने ही नक़ाबपोश चहरे में

जाने कितने स्याह राज़ छुपकर

जाने से पहले

बारूदी फटाखों से

शरारों की दीवाली मनाता है

दिलेरों की छाती को छलनी करवाता है

शहादतों के नारे लगवाता है

उनकी बेवाओं को ता-उम्र रुलाता है

माँ बहनों की आशाओं के दीप

अपने नापाक इरादों से बुझवाता है

और

फिर वही एहसान फरामोशी का चलन

कुछ नया करने के लिए

नया आवरण ओढ़कर

आ जाता है

पर अब उसका स्वागत कौन करे?

कौन उसके सर पर खुशियों का "ताज" रखे

जिसे खँडहर बनाकर

उसने रकीबी हसरतें पूरी कर ली

पर क्या हासिल हुआ?

हा हा कार मचा, भूकंप आया

ज़लज़ला थरथराया

और फिर सब थम गया

सिर्फ धरती का आंचल लाल हो गया

उन वीर सपूतों के लहू से

जिनकी याद हर साल

फिर ताज़ा हो जाती है

जब

पुराना साल जाता है

और नया साल आता है!!!

देवी नागरानी





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