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Friday, April 1, 2011

धूप में निकला न कर

ग़ज़ल

डरता है परछाई से तू गर
धूप में निकला न कर

तू समय की शाख से
वक़्त कुछ माँगा न कर

ठहरे पानी में ऐ नादाँ
संग यूँ फेंका न कर

आँच में अपने ग़मों की
ऐसे तो पिघला न कर

चेहरे पे चेहरा लगाकर
आईने बदला न कर

सोच की गलियों में जाकर
सीखे बिन लौटा न कर
देवी नागरानी

3 comments:

mridula pradhan said...

सोच की गलियों में जाकर
सीखे बिन लौटा न कर
bahut achchi baat....

हरीश सिंह said...

बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना,
मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके.समाज में समरसता,सुचिता लानी है तो गलत बातों का विरोध करना होगा,
हो सके तो फालोवर बनकर हमारा हौसला भी बढ़ाएं.
मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

Navin C. Chaturvedi said...

देवी नागरानी जी आप की ग़ज़लों की सभी तारीफ करते हैं| आप बहुत सलीके से अपनी बात कहती हैं|

डरता है परछाई से तू गर धूप में निकला न कर|
तू समय की शाख से वक़्त कुछ माँगा न कर||

मेरे पास आप की ई मेल आइ डी नहीं है| यदि आप को ऐतराज न हो तो navincchaturvedi@gmail॰com पर एक टेस्ट मेल भेजने की कृपा करें