Friday, November 9, 2007

दिवाली

दिवाली

मेरे मन की आशा ने दीपक जलाये
दिवाली की दहलीज़ पर जगमगाये.

अंधेरों से बाहर निकलकर मैं आई
वो यादों के जुगनू थे जब झिलमिलाये.

बड़ी खुशनुमा याद के की ताज़गी है
जो मुरझेए फूलों को फिर से खिलाये.

कई तीज त्यौहार बरसों से हमने
है मिल जुल के अपनों के संग में मनाये.

मंगलमय दशहरा दिवाली हो सबकी
फले फूले सब और खुशी से नहाये.

देवी नागरानी
9, नवंबर, २००७

1 comment:

Ila said...

बहुत सुन्दर !
इला