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12/25/2020

नारी कोई भीख नहीं

नारी कोई भीख नहीं 

न ही मर्द कोई पात्र है

जिसमें उसे उठाकर उंडेला जाता है  

जिसे उलट-पुलट कर देखा जाता है

उसके तन की खुशबू का मूल्य आँका जाता है

खरीदा जाता है, इस्तेमाल किया जाता है

तद पश्चात उसे 

तोड़ मरोड़ कर यूँ फेंका जाता है

जैसे कोई कूड़ा करकट भी नहीं फेंकता.

अब अवस्था बदलनी चाहिए   

अब वे हाथ कट जाने चाहिए

जो औरत को, अपना माल समझकर

आदान-प्रदान की तिजारती रस्में

निभाने की मनमानी करते हैं

सोचिये, सोचिये मत ग़ौर कीजिये

जब औरत वही क़दम उठा पाने की हिम्मत जुटा पाएगी, तब

तोड़ न पाओगे / न मोड़ पाओगे उस हिम्मत को 

जो राख़ के तले                                                                           

चिंगारी बनकर छुपी हुई है /

दबी हुई हैबुझी नहीं है

मत छेड़ोमत आज़माओ,

उसको जो जन-जीवन के /निर्माण का अणु है।

मत बनो हत्यारे /उन जज़्बों केउन अधूरे ख्वाबों के

जो ज़िंदा आँखों में पनपने की तौफ़ीक़ रखते हैं।


देवी नागरानी                                                                                                                                                                                               


नारी-जन्मदातिनी

 मर्द की जन्म्दातिनी है औरत

क्यों वह भूल जाता है इस सच को ---

कि वह जीती है, मरती है 

इस सृष्टि के निर्माण के लिए

जो अपने कोख में समाये हुए है

क्यों नहीं उसे दे पाता है वह मान सन्मान

जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है

क्यों वह सोचने की गलती कर बैठता है

वह सिर्फ़ व् सिर्फ़ उसके बच्चों को माँ है

और उसके घर की रखवाली की मात्र चौकीदारिनी

क्यों उसकी आशाओं, इच्छाओं को अपने स्वार्थ के चौखट पर

बार बार बलि पर चढाने की पहल करता हैं

क्यों वह भूल जाता है, कि वह जिंदा है,

सांस ले रही है, आग उगल सकती है.

नहीं! सोच भी कैसे सकता है वह,                                                       

जो अपने ही स्वार्थ की इच्छा के

सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहा है 

गंद दुर्गंध उनकी सांसों में मांसभक्षी प्रवृती व्यापित करती है

वही तो हैं, जो उसके तन को गोश्त समझकर

दबोचते, चबाते, निगलते स्वाद लेता है

भूल जाता हैं कि कभी वह गले में 

फांस बनकर अटक भी सकती है!

देवी नागरानी 

1/08/2014

किस बात का डर

आँखें बंद है मेरी 
तीरगी से लिपटा हुआ मेरा यह मन,
गहरे बहुत, गहरे धंसता चला जाता है 
अपने ही भीतर की खाइयों में, 
आखिर थक हार कर जब, 
मैं बेबसी में खुद को छोड़ देती हूँ, 
तब लगता है मुझे मैं रोशनी से घिर जाती हूँ , 
फिर मुझे डर नहीं लगता 
न जाने किस बात का डर पाल लिया था मैंने 
खुद से भी कोई डरता है क्या? 
अब मुझे डर नहीं लगता । 

 देवी नागरानी

12/19/2013

बेजुबान चीखें

“दिल धड़क उठा, तब

जब,

दिल दहलाती चीख गूंज उठी

यहीं कहीं, आस-पास

अपने ही भीतर, और

बेसदा सी वह आवाज़

घुटती रही, घुटती रही

पर

मैं कुछ न कर सकी !

“दिल सिसक उठा, तब 

जब, जाना

काले बादलों की क़बा भी

उसकी अंग-रक्षक न बन पाई

बेनाम, बेनंग आदम हमशरीक़ रहे

उस गुनाह में

जिसकी सज़ा आज

मानवता के सर पर

तलवार बन कर लटक रही है

बाखुदा! उस सज़ा में

नारी का रुआं रुआं हाज़िरी भर रहा है

आज भी, अभी भी, इस पल भी

पर कोई कुछ नहीं कर रहा!!

“दिल रोता है

जब आँखें देखती हैं

बेधड़क, बेझिझक घूमती बेहयाई

दिशाहीन वे दरिंदे, साज़िशी गिद्ध बनकर

पाकीज़गी को चीर-फाड़ रहे हैं।

जख्मी जिस्म से निकलती

तेज़ नुकीली चीखें

इन्सानियत की ख़ला में

अपने लाचार पंजे गाढ़ रही है

इस उम्मीद में, हाँ इस उम्मीद में, कि 

कोई तो एक होगा

मानवता का अंगरक्षक

जो इन लाखों आवाज़ों के बीच

सुनकर दिल दहलाती वह चीख 

एक उजड़ती ज़िंदगी को बचा पाये।

पर हर आस

बेआस होकर लौट रही है 

और

कोई कुछ नहीं कर पा रहा है!

आज भी चीखें

लटक रही हैं फ़ज़ाओं में

आज भी कासा-ए-बदन

भिखारी की तरह                                                                         
मांग रहा है

अपने ही भाई-बेटों से

अपनी बेलिबास क़ज़ा के लिए

एक लजा का कफ़न !

इस आस में, कि शायद

कोई कुछ कर सके!!

9/02/2013

चौपाल

चौपाल में 
आमने सामने हम खड़े हैं
पहले भी कई बार मिले हैं
मूकता की महफ़िलों में
आस-पास बैठे हैं
बनकर दोनों अजनबी!
और
मैं चाहती हूँ
मैं अनजान ही रहूँ तुम्हारे लिए,
और,
तुम भी मेरे लिए शायद……
पहचान
हर रिश्ते का अंत कर देती है।

8/24/2013

काला उजाला


वह एक धोबिन

अपनी ही दरिद्रता की

गंदगी में

अमीरी की मैल धोती है।

 

उस बाहरी उजलेपन को

देखने वाली आँखें

उसके पीछे का मटमैलापन

नहीं देख पातीं।

 

काश अमीरी भेद पाती  

तो यक़ीनन देखती और महसूसती

उस गंदगी की बदबू को

जो वह ओढ़ती रहती है बार-बार

सच मानिए, तब वह ज़रूर

एक उजला रुमाल

अपनी नाक पर ज़रूर धर देती।

देवी नागरानी

8/27/2011

मेरा अँत

मेरा अंत

मेरे आगे

हर पल प्रत्यक्ष होकर

मेरा मार्गदर्शक बनता है

खुली आँखों से मैं

उस सच को देखती हूँ

पर मंदबुधि की आंख

देख कर भी अनदेखा करती है

जानती है, पर

पहचानने से इनकार करती है

और, इसी तरह ज़िन्दगी का सूरज

सुबह का सफ़र तय करके

मेरे सर का साया बनकर

उसी ज़िन्दगी की ढलान से

ढलता हुआ नीचे उतर आता है

और मैं रोज़

यह दृश्य खुली आंख से देखती हूँ

फिर भी

खोई खोई सी रहती हूँ

शायद सच को पहचानने के प्रयास में!

देवी नागरानी

पहचान

हमारा वजूद इतिहास में दर्ज है

और होगा

हमारा आज

आने वाले कल के लिए

इतिहास का एक बीता हुआ पल ही सही

पर पन्नों में एक सुफ़्आ बना रहेगा.

देवी नागरानी

खोजा है एक सत्य

एकांत की गहराइयों में

डूबकर खोया एक सत्य

जो ज़ाहिर करता है-हमारे वजूद का बिछड़ना

अपने आप से जुदा होने की वेदना

उसकी छटपटाहट

एक खालीपन में खोकर

खुद को पाने की तलाश

ता-उम्र की तड़प !!

देवी नागरानी

ता-उम्र की तड़प

एकांत की गहराइयों में

डूबकर खोया जाना एक सत्य

जो ज़ाहिर करता है-

अपने वजूद का बिछड़ना

अपने आप से जुदा होने की वेदना

उसकी छटपटाहट

एक ख़ालीपन में खोकर

खुद को पाने की तलाश

ता-उम्र की तड़प !!

देवी नागरानी

एक खत ख़ुद के नाम

प्रिय देवी,

आज वक़्त की शाख़ से टूटकर एक लम्हां

मेरी याद के आँगन में आकर ठहरा है

कुछ सोचों का सिलसिला चलता रहा

फिर जाने कब वो कहाँ टूटता रहा,

और साथ उसके क्या क्या टूटा

क्या बताऊँ मैं तुम्हें?

इन्सान की फितरत बदली

साथ उसके बँट गए आँगन

दीवार बन गई रिश्तों के बीच में,

अँह की गर्दन तन गई,

इन्सानियत को खा गई इन्सान की हवस

सर्द हो गई प्यार की बाती

सन्नाटों की सल्तनत बाकी रही

जहाँ ठँडी छाँव को आदमी तरस रहे हैं.

तन तो खिज़ाओं की थपेड़ों से झड़ रहे हैं..

आगे और क्या लिखूँ? मन भर आया है

बस यादों के दीपक असुवन में झिलमिला रहे हैं,

बुझती हुई साँसों ने आज फिर चोट खाई है

इन यादों के आँगन में, जहाँ ठहरा हुआ वह पल

मेरे अस्तित्व को पुकार रहा है,

जाने कब मिलना हो?

तब तक,

तेरी परछाई

॥ जिसे वक्त की आँधी उड़ाकर फिर से आँगन में ले आई॥

देवी नागरानी

6/15/2011

आज और कल

यही वह समय है

जब वक़्त के गलियारे से

गुज़रते हुए

अपने बीते हुए "कल" का किवाड़

अपने पीछे बंद कर दें

और, आने वाले कल को

अपनाने के लिए 'आज' का दरवाज़ा खुला रखें

आज का वक़्त

उस अध्ययन में बिताएं

तो फिर शायद वो ग़लतियां

सामने न आए, जो

कल के किवाड़ के पीछे

हम बंद कर आए हैं.

देवी नागरानी

6/07/2011

अनकही यादें

मूक ज़ुबान


कुछ कहने की कोशिश में

फिर भी नाक़ाबिल रही

नहीं बयां कर पाई उन अहसासों को

जो उमड़ घुमड़ कर

यादों के सागर की तरह

उसकी प्यसी ज़ुबाँ के अधर तक आ तो जाते हैं

पर अधूरी सी भाषा में

वह अनकही दास्तां

बिना कहे, फिर मौन रह जाती है

यह बेबसी है उसके सिये हुऐ लबों की

जो आज़ादी के नाम पर

अब भी दहशतों की गुलामी में

जकड़े हुए हैं.

देवी नागरानी

6/05/2011

आस का दामन

यक़ीन की डोर पकड़ कर

मेरे इस मासूम से मन को

आस का दामन छूने की तमन्ना

अब तक है,

सामने सूरज की रौशनी

आस की लौ बनकर

जगमगा रही है

पर, जाने क्यों?

ज़िंदगी की दल-दल में

विवशता धँसती ही जा रही है

मेरी मुफ़लिसी की,

मेरी अपंगता की

जो मेरी अक्षमताओं का

प्रद्रशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ती

पर सांसें निराशा का दामन

छोड़ कर, आज भी

जीवन का हाथ थाम रही है

शायद उन्हें अपना मूल्य कथने की

आज़ादी है.

6/02/2011

रेती-रेती, साहिल-साहिल

बहता जीवन मेरी मँजिल

बह गई सब आशाएं

निराशाओं की धार में,

भूख, प्यास, चोरी, डाके

सब के सब हथियार गुनह के

कोई कैसे बचे बचाए,

चोर के घर में चोर जाए

कहो कैसे कोई किसे समझाए

देवी नागरानी

5/31/2011

मन की सियासत

समझ के बाहर है

खेल मन की सियासत का,

मन की सोच का जंगल भी

किसी सियासत से कम नहीं,

कभी तो ताने बाने बुनकर

एक घरौंदा बना लेती है

जहां उसका अस्तित्व

आश्रय पा जाता है,

या, कहीं फिर

अपनी ही असाधारण सोच

के नुकीलेपन से

अपना आशियां उजाड़ देती है.

होश आता है

उस बेहोश सोच को

जब लगता है उसे

पांव तले धरती नहीं

और वो छत भी नहीं

जो एक चुनरी की तरह

ढांप लेती है मान सन्मान.

मन की सियासत! उफ!!

यह सोच भी शतरंज की तरह

बिछ जाती है

जहां उसूलों की पोटली भर कर

एक तरफ रख देते हैं हम

और सियासत के दाइरे में

पांव पसार लेते है,

जहां पहनावा तो नसीब होता है

पर छत नहीं.

हां! वो स्वाभिमान को

महफूज़ रखने वाली छत,

वो ज़मीर को जिंदा रखकर

जीवन प्रदान करने वाली छत,

जिसकी छत्र छाया में

सच पलता है

हां! सच सांस लेता है.

देवी नागरानी

5/24/2011

मन की सइरा

मेरी यादों का सागर

हिचकोले खाता, लहराता

मेरे मन के अंतरघट को छूता है,

मेरी इच्छा, अनिच्छा के आंचल को

कभी तो भिगो कर जलमय करता,

कभी तो खुश्क मरुस्थल की तरह

छोड़ जाता है

जाने क्यों मेरा मन

प्यासा ही प्यासा

किसी अनजान, अद्रश्य

तट पर बसना चाहता है

जहां मेरे मन की सइरा

निर्जल होने से बच जाए

रेत-रेत ना रहे

पानी पानी हो जाए.

देवी नागरानी

5/20/2011

प्यास ही प्यास

मेरा मन एक रेतीला कण !

एक अनबुझी प्यास लेकर

बार-बार उस एक बूंद की तलाश में,

जैसे पपीहे को बरसात की वो पहली बूंद

वक्त के इंतज़ार के बाद मिली

और तिश्नगी को त्रप्त कर गई.

वैसे ही मेरा मन

हं! मेरा प्यासा मन

उसी अंतरघट के तट पर

कई बार इसी प्यास को बुझाने

अद्रश्य धारा की तलाश में

अनंत काल से भटक रहा है.

देवी नागरानी

5/02/2011

हकीकत

आज वो

मेरे सामने ठूंठ बनकर खड़ा है

देख रही हूँ पिछले तीन माह से

निरंतर देखती रही मैं

उसकी अठखेलियाँ

हरी भरी लहलहाती वो शाखें

हंसती, झूमती, नाचती वो पत्तियाँ

मौसम के हर रंग से भीगा

वो शजर, भूल गया था झड़ जाना है

उम्र ढली अब घर जाना है.

तमाम ज़िन्दगी बीती उसका

बीज से विस्फोटित होकर

विकसित हुआ, फला फूला

फिर भी, हर बदलता मौसम

उसे तन्हा करता जाता है

और आज

वह मेरे सामने उदास सा

ठूंठ बनकर खड़ा है

मैं उसे देख रही हूँ

वो खिड़की के उस पार

मैं खिड़की के उस पार खड़ी हूँ.

देवी नागरानी

वक्त का तकाज़ा


हम मात खाकर लौटें या

विजयी होकर!

खुद को मालामाल करें या कंगाल

हीरे लेकर साथ जायें या कंकर

अपनी टकसाल के हम खुद वारिस हैं.

जन्म सिद्ध अधिकार है

अख़्तयार पाने के लिए

हमें थोडा सा वक़्त

अपने उस निजी काम के लिए निकलना होगा!

देवी नागरानी