जीवन के तट पर-मेरे मन की सइरा में सफ़र करते जब मेरे पाँव थक जाते हैं तब कलम का सहारा ले कर शबनमी सपने बुनने लगती हूँ. प्यास की आस बंध जाती है, सफर बाकी कुछ और.... सिर्फ थोड़ा और.....
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8/30/2017
Main Anjaane mein
5/07/2014
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे
ग़ज़ल
कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे
जाने क्या था उसे गिला मुझसे
चंद साँसों की देके मुहलत यूँ
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे
क्या लकीरों की कोई साज़िश थी
रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे
जो भरोसे को मेरे छलता है
वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे
शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो
कह गई अपना हर गिला मुझसे
ऐब मेरे गिना दिये जिसने
दोस्त बनकर गले मिला मुझसे
जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको
ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे
8/29/2011
कुछ न कह कर भी सब कहा
ग़ज़ल
कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे
जाने क्या था उसे गिला मुझसे
चंद साँसों की देके मुहलत यूँ
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे
रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे
जो भरोसे को मेरे छलता है
वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे
शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो
कह गई अपना हर गिला मुझसे
ऐब मेरे गिना दिये जिसने
दोस्त बनकर गले मिला मुझसे
जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको
ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे
हमने पाया तो बहुत कम है
ग़ज़लः
हमने पाया तो बहुत कम है, बहुत खोया है
दिल हमारा लबे-दरिया पे बहुत रोया है
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है
अर्सा लगता है जिसे पाने में वो पल में खोया
बीज अफसोस का सहरा में बहुत बोया है
तेरी यादों के मिले साए बहुत शीतल से
उनके अहसास से तन-मन को बहुत धोया है
होके बेदार वो देखे तो सवेरे का समां
जागने का है ये मौसम वो बहुत सोया है
बेकरारी को लिये शब से सहर तक ये दिल
आतिशे-वस्ल में तड़पा है, बहुत रोया है
इम्तहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिये हैं ‘देवी’
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है
देवी नागरानी
8/28/2011
मताये कुव्वते ईमान
गज़लः
मताये कुव्वते ईमान का जोया कहाँ हूँ मैं
तहज्जुद की नमाजौं में अभी रोया कहाँ हूँ मैं
शजर एक सायादार उग आये जिस के खुश्क सीने से
अभी वो बीज मिटटी में तेरी बोया कहाँ हूँ मैं
तुम्हारे ख्वाब और ताबीर मेरी कोई तुक भी है
अरे बेदार मग्जो!! उम्र भर सोया कहाँ हूँ मैं
अभी कुछ शर्मसारी हो अभी कुछ अश्क बहने दो
जो दाग उभरे हैं दामन पर उन्हें धोया कहाँ हूँ मैं
तेरी आँखौं से आँसु के बजाये खून जारी हो
कहानी दुःख भरी सुन कर अभी रोया कहाँ हूँ मैं
पहाडौं ने जिसे धोने से माजूरी जताई थी
अभी तक सर पे अपने बोझ वो धोया कहाँ हूँ मैं
मेरी चीखौं को सब नगमा समझ कर दाद देते हैं
अज़ीज़ इस शहरे बेएहसास में खोया कहाँ हूँ मैं
शायरः अज़ीज़ बेलगामी
गायकः गुलोकार रफ़ीक़ शेख़
गायकः गुलोकार रफ़ीक़ शेख़
8/27/2011
बहता रहा जो दर्द का सैलाब
ग़ज़ल
बहता रहा जो दर्द का सैलाब था न कम
आंखें भी रो रही हैं, ये अशआर भी है नम
रिश्तों के नाम जो भी लिखे रेगज़ार पर
कुछ लेके आंधियां गईं, कुछ तोड़ते हैं दम.
मुरझा गई बहार में, वो बन सकी न फूल
मासूम-सी कली पे ये कितना बड़ा सितम
रोते हुए-से जश्न मनाते हैं लोग क्यों
चेहरे जो उनके देखे तो, असली लगे वो कम
देवी नागरानी
8/26/2011
हाल अक्सर पूछते थे, क्या हुए
डा. गिरिराजशरण अग्रवाल की एक ग़ज़ल
हाल अक्सर पूछते थे, क्या हुए
लोग जो अच्छे-भले थे, क्या हुए क्या हुईं वे छाँव वाली शीशमें
पंछियों के घोंसले थे, क्या हुए
अब तो इन शाखों पे कलियाँ तक नहीं
फूल जो कल खिल रहे थे, क्या हुए
दूरियों में कल निकटता शेष थी
वे जो कल तक फ़ासले थे, क्या हुए
फूँकना घर औ’ तमाशा देखना
शहर में कुछ दिलजले थे, क्या हुए
अब से पहली यात्रा में दोस्तो,
सीधे-सीधे रास्ते थे, क्या हुए
8/25/2011
नहीं पत्थर पिघलते हैं
शिवदत्त अक्स की एक ग़ज़ल
यूँ ही आहों की गरमी से नहीं पत्थर पिघलते हैं
चले जब आंधियाँ घर में, नहीं फिर दीप जलते हैं
हुई जब भी मुलाकातें, गले मिल मिल के रोते थे
बड़ी है बेबसी इतनी नहीं अब अश्क ढलते हैं
कभी कागज़ के फूलों पे न भंवरे गुनगुनाते हैं
न शम्अ हो अगर रौशन नहीं परवाने जलते है
वो क्या जानेंगे ये बातें मुहब्बत से जो डरते हैं
वो समझेंगे ये किस्से जो उल्फ़त में मचलते है
जमाना था हमारी राहें इक मंज़िल पे मिलती थी
मिलते अक्स और वो अक्सर नहीं पर साथ चलते हैं
8/24/2011
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