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4/08/2026

नारी मन की रूदाद

 








प्रिय सखी

आज तुम्हारे मन की भावनाएं शब्दों में पढ़ी  

पढ़ना क्या था,

लगा कोई मेरी चमड़ी खुरेच रहा है

अपने नुकीले नाखूनों से

क्या कहूँ, क्या लिखूं? मेरे कहने के पहले

सब कुछ तो तुम कह देती हो,

औरत के ख़ालीपन के हर कोने को भर देती हो 

सोचती हूँ,                                                                                                             मैं अपनी सोच को कहाँ सजाकर रखूँ,

किस पैरहन में वह सजेगी

क्या रेशम में, या सूत की उस सादगी में

या फिर ऐसे ही किसी पैरहन में 

जैसे निर्भया के कासाए बदन का बयान लिखा गया था 

या अभी कुछ दिन पहले की बात है 

जो नए नग्न पहरावन के साथ  

शब्दों में सजाई गई थी वह बालिका

क्या आज वह पैरहन भी पुराना हो गया?

गर्मजोशी क्या क्षीण पड़ गई है  

उस सूत कातती बुढ़िया को मेरा संदेश भी भेजना

कहना उससे -अब वह सूत कातना बंद कर दे

जो नारी को ढाँपने के काम नहीं आता

और तो और 

कृष्ण की तरह कोई अंगरक्षक भी नहीं आता,

इसलिए हो सके तो कुछ ऐसा कवच बुनो 

जिसको कोई, तार तार न कर पाए

हाँ यह ज़रूर हो कि 

तार तार करने वाले हाथ छलनी हो जाए.

सखी यह तेरी नहीं, मेरी नहीं

हर नारी मन की रूदाद है!

देवी नागरानी

 

 




4/07/2026

नारी कोई भीख नहीं

नारी कोई भीख नहीं

न ही मर्द कोई पात्र है

जिसमें उसे उठाकर उंडेला जाता है  

जिसे उलट-पुलट कर देखा जाता है

उसके तन की खुशबू का

मूल्य आँका जाता है

खरीदा जाता है, इस्तेमाल किया जाता है...!

तद पश्चात उसे 

तोड़ मरोड़ कर यूं फेंका जाता है

जैसे कोई कूड़ा करकट फेंकता है...!

अब अवस्था बदलनी चाहिए   

अब वे हाथ कट जाने चाहिए

जो औरत को

अपना माल समझकर

आदान-प्रदान की तिजारती रस्में

निभाने की मनमानी करते हैं

यह भूल जाते हैं---

वह जिंदा है, सांस ले रही है,

आग उगल सकती है.... 

नहीं! सोच भी कैसे सकते हैं?

वे, जो अपने ही स्वार्थ की इच्छा के

सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहे हैं

गंद दुर्गंध उनकी सांसों में

मांसभक्षी प्रवृती व्यापित करती है

वही तो हैं, जो उसके 

तन को गोश्त समझकर

दबोचते, चबाते, निगलते स्वाद लेते हैं

भूल जाते हैं कि

कभी वह गले में 

फांस बनकर अटक भी सकती है...!


4/01/2026

मेरी यादों का आकाश

मेरी यादों के आकाश तले

दबी हुई है मेरे ज़मीर की धरती

थक चुकी है, बोझ उठाकर

अपने जेहन के आँचल पर

झीनी चुनरिया जिसकी

तार-तार हुई है

उन दरिंदों के शिकंजों से

उन खूंखार नुकीली नज़रों से, जो

शराफ़त का दावा तो करते हैं, पर

दुश्वारियों को खरीदने का

सामान भी रखते हैं।

बिक रहा है ज़मीर यहाँ

बस बची है अंगारों के नीचे

दबी हुई कुछ राख़ मेरे

ज़िन्दा जज़्बों की

जो धाँय धाँय उड़कर

काला स्याह कर रही है

मेरे यादों के आकाश को


 

माँ ने कहा था

मैं गाड़ी के नीचे आते आते

बच गई थी!

तब मैं छोटी थी....

और

माँ ने यह भी कहा था

आने वाले कल में

ऐसे कई हादसों से

मैं खुद को बचा लूँगी

जब मैं बड़ी हो जाऊँगी.....

पर

कहाँ बचा पाई मैं खुद को

उस हादसे से?

दानवता के उस षड्यंत्र से?

जिसने छल से

मेरे तन को, मेरे मन को

समझकर एक खिलौना

खेलकर, तोड़-मरोड़ उसे -

फेंक दिया वहाँ,

जहाँ कोई रद्दी भी नहीं फेंकता!

उफ़!

बीमार मानसिकता का शिकार

वह खुद भी,

ज़िन्दा रहने का सबब ढूँढता है!

सच तो यह है

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं होता!

 

याद आया

माँ ने ये भी कहा था

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं होता !


 

3/31/2026

खुद से अनजान

 







जब तक खुद से मिली थी।

अनजान थी!

एक नहीं, अनेक सच्चाइयों से

जिन्हें मैं अपने ही कफ़स से ढकती रही

गंधारी की तरह खुली आंखों पर

पट्टी बांधकर

हर सच्चाई को टटोलते हुए

नकारती रही.

क्या कभी देखा अनदेखा एक हो सकता है?

जुर्म और सज़ा को एक तराजू में तोला जा सकता है?

नहीं ना?

तो फिर क्यों सवाल किया?

मन ने युधिष्ठिर की तरह

कि सौ जनम तक कोई गुनाह नहीं हुआ है मुझसे

फिर क्यों यह बीनाई मेरे हिस्से में आई?

कृष्ण ने कहा था:

नियति टल नहीं सकती

किसी की भी नहीं!

जन्मों का कर्ज एक जनम में तो

उतरने वाला नहीं

यह मानव जनम बड़ा ही मुश्किल

मंद बुद्धि के कारण

समझ पाना मुश्किल

पर अपना ही बोया हुआ

खुद की काटना पड़ता है।

यह तय है।

बस मानना है,

स्वीकारना है,

बिना किसी दलील के

यही बेबसी का अंतिम चरण

नियति बन जाता है।

 

 








 


गुरबत का सूद

नहीं चुका पाऊँगी मैं

उस बनिए के बिल को

गिरवी जिसके पास रखी है मेरी गुरबत, 

यही तो मेरी पूँजी है 

जो निरंतर बढ़ती जा रही है                                                                 

कर्ज़ के रूप में                                                                           

जिसे खाती जा रही है, 

निगलती जा रही है                                                                       

मेरी इच्छाओं की भूख!  

और साथ उसके

 बढ़ रहा है सूद भी

हाँ सूद उन पैसों पर

जो मैंने कभी लिए ही न थे

हाँ ले आई थी पेट की खातिर

दो मुट्ठी आटा, चार दाने चावल

कभी दाल तो कभी साबू दाने, 

उबाल कर अपने ही गुस्से के जल में

पी जाती हूँ।

पिछले कई सालों से

हाँ, गुज़रे कई सालों से लगातार

झुकते झुकते, मेरी गुरबत की कमर

अब दोहरी हो गई है

न कभी सीधी हुई, न होगी

अमीरों के आगे

कर्ज़दार थी, और सदा रहेगी !

क्या चुका पाएगी, वह कर्ज़,

हाँ, वह कर्ज़ जो गुरबत ने लिया

उस सूदखोर अमीरी से।

न जाने कितनी सदियाँ बीतेंगी

उसे चुकाने में

खुद को आज़ाद करा पाने में!


                                                                           

                 


3/30/2026

दर्द का अहसास

 कभी तो होगा....                                                    

दामिनी के दर्द का अहसास

उन धड़कते दिलों को                                                                  

यक़ीनन आज नहीं तो कल

आने वाले कल में, या

होगा तब जब उनकी अपनी माँ -बहन

बेटी बहू या बीवी खुद

रेंगती हुई छटपटाएगी

उन शिकंजों के चंगुल में,  

जो पाठ मानवता का

कभी पढ़ नहीं पाये, जिनके

दूध में और ख़ून में शायद                                                                  

कभी इंसानियत घुल ही न पाई!

क्या समझेंगे वे पीड़ा नारी के अपमान की

निर्वस्त्र जब उसकी परतें हुईं

बेलिबासी जिस्म ने जब ओढ़ ली।

कोई पांडव, कृष्ण कोई अंग-वस्त्र न ला सका!

कोई सुन न पाया उस उबलते लहू की पुकार

जो किसी दुखियारी माँ की बद्दुआ की चीख बनी

जो आग के बदले, आहों को उगलती रह गई                                                          

और उगलती ही रहेगी उस समय तक, जब तक

उस आह के उगले पिघलते लावा में

धंस न जाएगी दरिंदगी,

दर्द की उस बाढ़ में तब तक नहाएगी गंदगी.

तब अहसास होगा, ज़रूर होगा

उन्हें, दामिनी के इस दर्द का

जो ज़िंदगी में जीते जी दाह पर आह भरती रह गई!