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3/21/2026

Ghazal

 

ग़ज़लः



राजनीति साज़िशों की कब समझ में आएगी

चालबाज़ी शोरिशों की कब समझ में आएगी

किस लिये टकराव है ये आज इन्सानों के बीच
बात बेजा रंजिशों की कब समझ में आएगी

ख़ाली होने से ही पहले वो कुआँ भर जाएगा
बेपनाही ख़्वाइशों की कब समझ में आएगी

छत टपकती है अभी गीले दरो-दीवार हैं
ये तबाही बारिशों की कब समझ में आएगी

क्यों शरारे आसमां की सिम्त बढ़ जाने को हैं
यह नुमाइश जुगुनुओं की कब समझ में आएगी

कर रहे हैं पासबां सौदे शराफ़त के बहुत
सादगी इन साज़िशों की कब समझ में आएगी

हाथ की रेखाओं से हम किस क़दर मजबूर हैं
बेबसी इन गर्दिशों की कब समझ में आएगी...


कर रहा कोई और है

ग़ज़ल -2122 2122 2122 212 

नाम तेरा नाम मेरा कर रहा कोई और है
खालीपन जीवन का हर पल भर रहा कोई और है-1 

क्या मेरी पहचान है, क्या जात क्या औकात क्या 
नेक नामी संग मेरे कर रहा कोई और है-2 

रफ़्ता रफ़्ता चलते चलते नक्शे पा जो भी मिले 
हमक़दम हो हर क़दम पग धर रहा कोई और है-3 

पंख घायल है परिंदा ऊँचा उड़ सकता नहीं 
बेख़बर बेकस वो है, पर बाख़बर कोई और है-4 

जीना मरना जागना सोना लगे सपना मुझे 
मेरे भीतर जीते जी क्यों डर रहा कोई और है-5 

तुम लिखो बिल्कुल लिखो पर यह हक़ीक़त याद हो 
सोच तेरी शब्द उसमें भर रहा कोई और है 

पार कश्ती जो लगाए सब उसे है जानते 
बेख़बर ‘देवी’ मगर रखता ख़बर कोई और है-७ 
देवी नागरानी

12/25/2020

ग़ुरबत का सूद

नहीं चुका पाऊंगी मैं

उस बनिए के बिल को

गिरवी जिसके पास रखी है मेरी गुरबत,

यही तो मेरी पूंजी है, जो निरंतर बढ़ती जा रही है                                                                   

कर्ज़ के रूप में                                                                            

 जिसे खाती जा रही है,                                                                   

जिसे निगलती जा रही है, मेरी इच्छाओं की  भूख                                                                                                                                               

और साथ उसके, बढ़ रहा है सूद भी                                                            

हाँ सूद, उन पैसों पर , जो मैंने कभी लिए ही न थे!                                                                    

हा, पेट की खातिर ले आई थी

दो मुट्ठी आटा, चार दाने चावल

कभी दाल तो कभी साबू दाने, 

उबाल कर अपने ही गुस्से के जल में

पी जाती हूँ

पिछले कई सालों से, हाँ गुज़रे कई सालों से लगातार

झुकते झुकते, मेरी गुरबत की कमर

अब दोहरी हो गई है

न कभी सीधी हुई, न होगी, उस सूदखोर अमीरों के आगे

कर्ज़दार थी, और सदा रहेगी!


देवी नागरानी

 

 

                                           

नारी कोई भीख नहीं

नारी कोई भीख नहीं 

न ही मर्द कोई पात्र है

जिसमें उसे उठाकर उंडेला जाता है  

जिसे उलट-पुलट कर देखा जाता है

उसके तन की खुशबू का मूल्य आँका जाता है

खरीदा जाता है, इस्तेमाल किया जाता है

तद पश्चात उसे 

तोड़ मरोड़ कर यूँ फेंका जाता है

जैसे कोई कूड़ा करकट भी नहीं फेंकता.

अब अवस्था बदलनी चाहिए   

अब वे हाथ कट जाने चाहिए

जो औरत को, अपना माल समझकर

आदान-प्रदान की तिजारती रस्में

निभाने की मनमानी करते हैं

सोचिये, सोचिये मत ग़ौर कीजिये

जब औरत वही क़दम उठा पाने की हिम्मत जुटा पाएगी, तब

तोड़ न पाओगे / न मोड़ पाओगे उस हिम्मत को 

जो राख़ के तले                                                                           

चिंगारी बनकर छुपी हुई है /

दबी हुई हैबुझी नहीं है

मत छेड़ोमत आज़माओ,

उसको जो जन-जीवन के /निर्माण का अणु है।

मत बनो हत्यारे /उन जज़्बों केउन अधूरे ख्वाबों के

जो ज़िंदा आँखों में पनपने की तौफ़ीक़ रखते हैं।


देवी नागरानी                                                                                                                                                                                               


नारी-जन्मदातिनी

 मर्द की जन्म्दातिनी है औरत

क्यों वह भूल जाता है इस सच को ---

कि वह जीती है, मरती है 

इस सृष्टि के निर्माण के लिए

जो अपने कोख में समाये हुए है

क्यों नहीं उसे दे पाता है वह मान सन्मान

जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है

क्यों वह सोचने की गलती कर बैठता है

वह सिर्फ़ व् सिर्फ़ उसके बच्चों को माँ है

और उसके घर की रखवाली की मात्र चौकीदारिनी

क्यों उसकी आशाओं, इच्छाओं को अपने स्वार्थ के चौखट पर

बार बार बलि पर चढाने की पहल करता हैं

क्यों वह भूल जाता है, कि वह जिंदा है,

सांस ले रही है, आग उगल सकती है.

नहीं! सोच भी कैसे सकता है वह,                                                       

जो अपने ही स्वार्थ की इच्छा के

सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहा है 

गंद दुर्गंध उनकी सांसों में मांसभक्षी प्रवृती व्यापित करती है

वही तो हैं, जो उसके तन को गोश्त समझकर

दबोचते, चबाते, निगलते स्वाद लेता है

भूल जाता हैं कि कभी वह गले में 

फांस बनकर अटक भी सकती है!

देवी नागरानी 

8/30/2017

Main Anjaane mein

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5/07/2014

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे


ग़ज़ल

कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे

जाने क्या था उसे गिला मुझसे

चंद साँसों की देके मुहलत यूँ

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे

क्या लकीरों की कोई साज़िश थी

रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे

जो भरोसे को मेरे छलता है

वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे

शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो

कह गई अपना हर गिला मुझसे

ऐब मेरे गिना दिये जिसने

दोस्त बनकर गले मिला मुझसे

जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको

ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे