साहिल-साहिल रेती-रेती
जीवन के तट पर-मेरे मन की सइरा में सफ़र करते जब मेरे पाँव थक जाते हैं तब कलम का सहारा ले कर शबनमी सपने बुनने लगती हूँ. प्यास की आस बंध जाती है, सफर बाकी कुछ और.... सिर्फ थोड़ा और.....
5/12/2026
आई है ख़ुशियों की भोर
4/26/2026
मेरी छत, मेरी छत
अरे कोई ढूंढो मेरी छत, मेरी छत
चली जाने कैसी विदूषित हवाएं
उड़ा कर चली वो मेरी छत, मेरी छत
पनाह पा रहा था जो दामन वहीं पर
उड़ा कर चली वो मेरी छत, मेरी छत
बुने ताने बाने जो अहसास के वो
उड़ा कर चली वो मेरी छत, मेरी छत
जो पलकों पे अश्कों के मोती बिखेरे
बहा कर चली वो मेरी छत, मेरी छत
4/23/2026
विष को पीना होगा.
मौत के शिकंजे से
आज़ाद करवाना है।
अवसर यही है
जानती हूँ, पर पहचानती नहीं
उस सच को, जो
निरंतर कहता है--
‘‘जीवन पाना है, तो
विष को पीना होगा’’
विष!
विष तो जीवन को मार देगा
जीवन दान कैसे दे सकता है?
जो ख़ुद कड़वाहटों का जाम है
अमृत कैसे बन सकता है?
इसी अविश्वास में मैं,
हर इक पल जीती हूँ, जीते जीते मरती हूँ
गर यही जीवन है
तो इस बार,
इस बार उस सत्य को
जो निरंतर कहता है
‘‘जीवन पाना है, तो
विष को पीना होगा’’
उस सत्य पर विश्वास करके
अपने भीतर के
सारे अविश्वास मिटाना चाहती
हूँ।
शायद इस जीवन को जीते जीते
मैं जान गई हूँ
कि मैं उस विष को पिये बिना
जीवित नहीं रह सकती।
देवी नागरानी
4/21/2026
विडम्बना
यह कैसी विडम्बना है?
मेरे चाहने पर भी, कोई
खुली आँखों से देखता नहीं
मेरी छटपटाहट महसूस करता नहीं।
क्यों कोई,
मेरे भीतर झांक नहीं पाता?
कहीं ऐसा तो नहीं मैंने ख़ुद
अपने दिल का दरवाज़ा भीतर से
भींच लिया है और नज़रबंद कर
लिया है
खुद को अपनी तनहाइयों के साथ,
जो घर बसाकर बैठी हैं मेरे भीतर
शायद, इस इंतज़ार में
कि एक न एक दिन
मैं दुनिया के शोर से
बेज़ार होकर, बेताबी से
अपने ही भीतर
उस बंद दरवाज़े पर दस्तक दूँ,
और
पल भर में मेरी तन्हाइयाँ
बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे
मुझे अपने आलिंगन में भर लें!
4/20/2026
वसीयत
वसीयत उसके सामने थी
उस पर सिर्फ़ और सिर्फ़
हस्ताक्षर करने थे!
वह जानती थी, सब कुछ जानती थी
क्या हो रहा है?
क्यों हो रहा है?
उसके मरने का इंतज़ार
हाँ, उसी का इंतज़ार था
पर, उसके पहले ज़रूरी था
इन कोरे कागजों पर
लिखे काले अक्षरों के तले
हस्ताक्षर करना!
उसके सामने रखी वसीयत में
सभी ने अपनी चाहतों को
अपनी -अपनी जरूरतों को दर्ज किया
बस भूल गए वो मेरी चाहत
ज़रूरत तो बहुत दूर की बात थी,
मैंने भी लिखकर दो शब्द
हस्ताक्षर कर दिये
यही लिखा था:
‘‘आज तुम हाक़िम हो
कल तुम्हारे वंशज हुक़ूमत
करेंगे,
यहाँ, इसी जगह
बिना तुम्हारी ज़रूरत जाने,
वे तुम्हारे हस्ताक्षर खुद ही
कर लेंगे,
तुम्हारी उनको ज़रूरत नहीं
रहेगी,
यहीं से नया इतिहास शुरू होगा।
देवी नागरानी
4/13/2026
वह छत नहीं मिली
सोच का जंगल भी,
किसी सियासत से कम नहीं,
कभी तो ताने-बाने बुनकर
एक घरौंदा बना लेता है
जहाँ उसका अस्तित्व आश्रय पा
जाता है,
या, फिर कहीं
अपनी ही असाधारण सोच के
नुकीलेपन से
अपना आशियाँ उजाड़ देता है।
जब होश आता है, तब उसे लगता है
पांव तले धरती नहीं,
और वह छत भी नहीं,
जो एक चुनरी की तरह
ढांप लेती है उसका मान सम्मान!
मन की सियासत, उफ़!
यह सोच भी शतरंज की तरह
कुछ यूँ बिछ जाती है
बस, उसूलों की पोटली भरकर
हम एक तरफ़ रख देते हैं
और
सियासत के दायरे में
पाँव पसार लेते हैं
जहाँ आवरण तो नसीब होता है, पर
वह छत नहीं मिलती,
जो स्वाभिमान को महफूज़ रख पाये
ज़मीर को जिंदा रखकर जीवन
प्रदान करे
वह छत,
जिसकी छत्र छाया में
सच पलता है
वह मिलकर भी नहीं मिलती !
4/10/2026
उत्पादन का ज़माना
अर्थ शास्त्र का अर्थ है उत्पादन!
सभी को उत्पादक होना है
वर्ना फिज़ूल है अस्तित्व!
समय से समय निकालकर
इन फिज़ूल अस्तित्व वालों को
समय देना भी
फिज़ूल ख़र्ची मानी जाती है,
समय का सदुपयोग है उत्पादन में
जहाँ संसार भर की सुविधाएँ
उपलब्ध हों, लेकिन
उनका भोग करने के लिए
किसी के पास समय न हो!
यह कैसा अर्थशास्त्र है
जिसके अर्थों में
अनर्थों की संभावना पनप रही है
परिवार नामक संस्था की
नींव रखने वाले निर्वासित हो
रहे हैं
ऐसे में घरों में सन्नाटा बस
गया है
बूढ़े कहीं दिखाई नहीं देते!
जवानी की दहलीज़ पार करते ही
एक अवस्था आती है जीवन में
जहाँ आदमी न जवान रहता है, न बूढ़ा
यह उसी समय की व्यथा है--
उत्पादन का न होना।
जवान बड़े होते हैं,
बूढ़ों को बूढ़ा होने के पहले,
बूढ़ा करार दिया जाता है
नौजवान, उनके लिए स्थापित किए गए
वृद्धाश्रम में उन्हें छोड़ आते
हैं,
वहीं, जहाँ उन्हें
अपना कल महफ़ूज नज़र आता है।
अब सोचिए,
नव पीढ़ी के इस सोच का आविष्कार
क्या क्या न देगा,
आने वाले कल के वारिसों को
जब घर में बूढ़े न होंगे?
कौन सुनाएगा उन बच्चों को
वे लोरियाँ, जो
सपनों के संसार से उन्हें
जोड़ती हैं,
वो बचपन के किस्से...
तोता मैना की कहानी...
वो बाबा की बातें...
वो अम्मा की लोरी...
वो गायत्री मंत्र का पाठ,
घर आँगन में तुलसी का रोपना...
और...
हनुमान चालीसा का दोहराया जाना...
सभी कुछ तो छूट जाएगा
समय की तंग गलियों में खो जाएगा
और ऐसे संकीर्ण जीवन के
सूत्रों से जुड़कर आदमी
असमय ही, जीवन जीने के पहले
बूढ़ा हो जाएगा।
पर,
कोई क्या कर सकता है
इस उत्पादन के ज़माने में?
यह वक़्त की मांग है
अपने ही स्थापित किए हुए
वृद्धाश्रमों में
उन्हें जाना होगा......
आश्रय लेना होगा!
देवी नागरानी
