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3/22/2026

अगर तुम समझते हो


अगर तुम समझते हो, कि

तुमने मुझे जंजीरों में जकड़ लिया है

तो गलत समझा है

मत समझो कि मैं

तुम्हारी चाल के चंगुल से            

खुद को आज़ाद कराने के रास्ते

अपने पीछे बंद कर आई हूँ.

यह तुम्हारी नादानी होगी!

इतनी नादां तो मैं नहीं, 

जो अपनी आज़ादी को

तुम्हारी रीति--रस्मों के खूंटे से बाँध आऊँ, और

उस ताले की चाबी तुम्हें सौंप 

गुलामी की ज़ंजीरें पहन लूँ!

वह चाबी तब भी मेरे पास थी

अब भी मेरे पास है,

अरसा हुआ इस्तेमाल करके

 

कुछ जंग ज़रूर लग गई उसे 

पर है तो वही चाबी,

यह भी जानती हूँ मैं

जो चाबी ताला बंद करती है

वही उसे खोलती भी है!

देवी नागरानी

 

कोई नारी मन से पूछे

 

त्रस्त हुई मानवता कितनी, कोई नारी मन से पूछे

हद है कितनी दानवता की,  कोई नारी मन से पूछे

बेघर निर्वासित सी नारी, फिरती क्यों है मारी-मारी
बाहर-भीतर क्यों है भटकी, कोई नारी मन से पूछे

बाहर की लौ जगमग-जगमग, भीतर के क्यों जली बुझी है                                                              मन में घोर अमावस कैसी कोई नारी मन से पूछे         
                               

कड़वे बोल का विष है बरसे, मीठे बोल को पल पल तरसे                                                              जली कटी वो कितना सुनती कोई नारी मन से पूछे                     

घुट घुट कर वो मरती है, मर-मर कर वो जीती है                                                                   आहों में चिंगारी सुलगी,  कोई नारी मन से पूछे पूछे.

जीवन शैया पर होता है,  दाह दामिनी का नित देवी

कितना जीती, कितना  मरती, कोई नारी मन से पूछे


 

आई है ख़ुशियों की भोर

मस्त फ़िजाँ मेँ भीनी भोर

ख़ुशबू देती चारों ओर

 

बादल गरजे घनघन घन घन

छाई घटा कारी घन घोर

 

रिमझिम रिमझिम पानी बरसे

प्यासा मोर मचाए शोर

 

कळ कळ कळ कळ पानी बहता

प्यास बुझाए प्यासे ढोर

 

ऊँची उड़ान भरे मन ऐसे

जैसे पतँग की कोई डोर

 

मदमाती मस्ती है देवी

आई है ख़ुशियों की भोर


3/21/2026

राजनीती साजिशों की कब समझ में आएगी

 

ग़ज़लः



राजनीति साज़िशों की कब समझ में आएगी

चालबाज़ी शोरिशों की कब समझ में आएगी

किस लिये टकराव है ये आज इन्सानों के बीच
बात बेजा रंजिशों की कब समझ में आएगी

ख़ाली होने से ही पहले वो कुआँ भर जाएगा
बेपनाही ख़्वाइशों की कब समझ में आएगी

छत टपकती है अभी गीले दरो-दीवार हैं
ये तबाही बारिशों की कब समझ में आएगी

क्यों शरारे आसमां की सिम्त बढ़ जाने को हैं
यह नुमाइश जुगुनुओं की कब समझ में आएगी

कर रहे हैं पासबां सौदे शराफ़त के बहुत
सादगी इन साज़िशों की कब समझ में आएगी

हाथ की रेखाओं से हम किस क़दर मजबूर हैं
बेबसी इन गर्दिशों की कब समझ में आएगी...


कर रहा कोई और है

ग़ज़ल -2122 2122 2122 212 

नाम तेरा नाम मेरा कर रहा कोई और है
खालीपन जीवन का हर पल भर रहा कोई और है-1 

क्या मेरी पहचान है, क्या जात क्या औकात क्या 
नेक नामी संग मेरे कर रहा कोई और है-2 

रफ़्ता रफ़्ता चलते चलते नक्शे पा जो भी मिले 
हमक़दम हो हर क़दम पग धर रहा कोई और है-3 

पंख घायल है परिंदा ऊँचा उड़ सकता नहीं 
बेख़बर बेकस वो है, पर बाख़बर कोई और है-4 

जीना मरना जागना सोना लगे सपना मुझे 
मेरे भीतर जीते जी क्यों डर रहा कोई और है-5 

तुम लिखो बिल्कुल लिखो पर यह हक़ीक़त याद हो 
सोच तेरी शब्द उसमें भर रहा कोई और है 

पार कश्ती जो लगाए सब उसे है जानते 
बेख़बर ‘देवी’ मगर रखता ख़बर कोई और है-७ 

12/25/2020

ग़ुरबत का सूद

नहीं चुका पाऊंगी मैं

उस बनिए के बिल को

गिरवी जिसके पास रखी है मेरी गुरबत,

यही तो मेरी पूंजी है, जो निरंतर बढ़ती जा रही है                                                                   

कर्ज़ के रूप में                                                                            

 जिसे खाती जा रही है,                                                                   

जिसे निगलती जा रही है, मेरी इच्छाओं की  भूख                                                                                                                                               

और साथ उसके, बढ़ रहा है सूद भी                                                            

हाँ सूद, उन पैसों पर , जो मैंने कभी लिए ही न थे!                                                                    

हा, पेट की खातिर ले आई थी

दो मुट्ठी आटा, चार दाने चावल

कभी दाल तो कभी साबू दाने, 

उबाल कर अपने ही गुस्से के जल में

पी जाती हूँ

पिछले कई सालों से, हाँ गुज़रे कई सालों से लगातार

झुकते झुकते, मेरी गुरबत की कमर

अब दोहरी हो गई है

न कभी सीधी हुई, न होगी, उस सूदखोर अमीरों के आगे

कर्ज़दार थी, और सदा रहेगी!


देवी नागरानी

 

 

                                           

नारी कोई भीख नहीं

नारी कोई भीख नहीं 

न ही मर्द कोई पात्र है

जिसमें उसे उठाकर उंडेला जाता है  

जिसे उलट-पुलट कर देखा जाता है

उसके तन की खुशबू का मूल्य आँका जाता है

खरीदा जाता है, इस्तेमाल किया जाता है

तद पश्चात उसे 

तोड़ मरोड़ कर यूँ फेंका जाता है

जैसे कोई कूड़ा करकट भी नहीं फेंकता.

अब अवस्था बदलनी चाहिए   

अब वे हाथ कट जाने चाहिए

जो औरत को, अपना माल समझकर

आदान-प्रदान की तिजारती रस्में

निभाने की मनमानी करते हैं

सोचिये, सोचिये मत ग़ौर कीजिये

जब औरत वही क़दम उठा पाने की हिम्मत जुटा पाएगी, तब

तोड़ न पाओगे / न मोड़ पाओगे उस हिम्मत को 

जो राख़ के तले                                                                           

चिंगारी बनकर छुपी हुई है /

दबी हुई हैबुझी नहीं है

मत छेड़ोमत आज़माओ,

उसको जो जन-जीवन के /निर्माण का अणु है।

मत बनो हत्यारे /उन जज़्बों केउन अधूरे ख्वाबों के

जो ज़िंदा आँखों में पनपने की तौफ़ीक़ रखते हैं।


देवी नागरानी