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3/27/2026

बदनाम औरत

 

बदनाम औरत

बालक की कोख से जन्मी नारी

एक माँ, एक बहन, बेटी, बीवी,

और एक दाई माँ भी...                                                                                

हाँ, वही दाई माँ                                                                                 

जो थी तो औरत, पर

जच्चा की अनचाही मुराद के आगे

कुछ सिक्कों की खातिर

न जाने क्यों                                                                                  

बच्चे के गले पर अंगूठे का दबाव बढ़ाते हुए 

उसकी साँसों को घोंट देती है

हाय बेरहम,  

नारी को कलंक लगाया  

उस मासूम को मौत के घाट उतारा

जिसने खुली आँख से

दुनिया को नज़र भर देखा भी न था.

अब जाना, क्यों औरत बदनाम हुई है.

जब वह कैकेई बनी,

जब वह मंथरा बनी, 

वही अब दाई बनकर आई है।


 

जीवन एक यात्रा

 





मेरी जीवन यात्रा

उस पथिक जैसी है

जो ऊबड़ खाबड़ पगडंडियों पर 

अपने सामने उन अदृश्य पद चिन्हों पर

चलते हुए विश्वास से क़दम बढ़ा रहा है

कि कोई उसका मार्गदर्शक है

जो उसके आगे चल रहा है

देवी नागरानी

 

जीवन एक यात्रा (विचार मंथन)


मैं मात्रा मिट्टी , वह भी कच्ची

एक वही कुम्भार, जो मिटटी को सोना बना देता है

 

(करोना काल में आँखों के आगे रक्स करती स्मृतियाँ-जो जाने किन खलाओं में धंस गई थीं, अब एक एक करके सतह पर बिन बुलाये आ ही जाती है..शायद फिर से सांस लेकर इस काल के अंतिम पहर के साथ घुल मिल जाने के लिए...)

 

कहते सुना है और वक्त के साथ यह सच दोहराया भी जाता है-आत्मा अमर है, शरीर एक आवरण है जो बदलता रहता है. अगर वह शरीर मैं नहीं तो कौन है जिसका मैं आवरण हूँ? रूमी के दार्शनिक पहलुओं में कई जवाबों के बावजूद, अनेक सवाल फिर भी मंडराते रहते हैं.

जीवन भी तो एक यात्रा है, लंबी यात्रा, इस छोर से उस छोर तक. जिसमें पल्लवित होकर जीते हैं अहसास, भावनाएं, जज्बात, प्यार, दुलार, स्नेह के सौ-सौ स्वरूप. धीरे धीरे सब बदल जाता है, मौसमों की तरह, बहारों से खिज़ां तक का सफर करते हुए सूखे चरमराए ज़मीन पर पड़े पत्तों की तरह.

     जीवन वाक़ई एक जंग है, ता-उम्र जूझना, लड़ना और अंत में ठहराव के पहले मौत की फतह का परचम फहराना.  जन्म के वक्त पता ही नहीं पड़ता कि जन्मदातिनी कौन है और मौत के समय पता नहीं पड़ता कि कब्र में किसने लिटाया? जन्म पर किसने जश्न मनाया और मौत पर किसकी रुदादी चीख उठी. तब माँ की शीतल कोख थी अब धरती माँ की ठंडी गोद नसीब होती है.

अब जीवन को माप-तोलकर जीना तो उसका अंत लाने जैसा है. क्या कभी हवाओं को बिना मरज़ी रुख बदलते देखा है? जहां-जहाँ रुख हुआ, मुंह उठाकर चल दीं. आज मानवता भी हवाओं की मानिंद दिशाएं व् दशाएं बदलती जा रही है.

     साक्षात सच है तो बस मौत’. आए दिन देखते हैं खुली आंखों से, सुनते है अपने ही कुनबे से, कितने जन सब छोड़-छाड़ कर चले गए, पर लगता है फिर भी सब सपना सा है, भ्रम है जो टूटने का नाम नहीं लेता. अंत तक, जीने की लालसा हमारे हिस्से में है, मृत्यु औरों के लिए ! और तो और जब अपना कोई दिल से जुदा हो जाता है तो उनके जाने का गम हमें दिन रात सालता है. घर में, दिल में एक खालीपन भर जाता है जिसे कभी कोई और रिश्ता-नाता भर नहीं पाता.

     जब गुलशन में रहते हुए सतरंगी सुमन मुरझा जाएं तो यकीनन बागबाँ के दिल के किसी कोने में कुछ टूटता है. वह जो फूलों को औलाद की  मानिंद सींचता है, कली से फूल बनते देखता है और उनका अंत देखिए! ज़ालिम वक़्त क्या कहर बरपा कर जाता है? बावजूद इसके बाज़ारवाद का परचम बुलंदियों पर फहराया जा रहा है. पुराने ज़माने के कथा किस्सों में रिश्तों के निर्वाह निर्वाह का मापदंड जो भी था, आज के समय से और था, जिनकी गवाहियां साहित्य में दर्ज कहानियां व उपन्यास के अंश देते हैं.  सिन्धी साहित्य सेवी नारायण भारती जी की कहानी दस्तावेज में किरदार को क्लेम के कागज़ रद्द करने पड़े,  ताकि पैसे मिलने पर उस पार बसे हुए लोगों को फिर से उजड़ना न पड़े. कहीं, किसी कारणवश वह बाल-बच्चों वाला बंदा घर से बेघर न हो जाए. कागज़ फाड़ने का सबब एक ही था.घर जाएगा तो परिवार टूट जाएगा, बच्चे लावारिस हो जाएंगे.यह परिवार के संगठन को संगठित करने की सोच उस समय थी, इस समय तकाज़े कुछ और हैं, हकीक़तें कुछ और हैं. सब का बंटवारा होने लगा है. बागबांफिल्म इसी आधार की एक हकीकी जीवन गाथा,  आज हज़ारों घरों के बागबाँखुद निराधार होते चले जा रहे हैं. उनके लिए जीते जी स्वर्ग धाम, वृद्धाश्रम, आनंदश्रम, अपना घर, नाम से विशेष आकर्षक स्थान बनाए जा रहे हैं. आज की पीढ़ी अपनी औलाद का फर्ज़ तो पूरा कर सकती है, पर अपने माँ-बाप का कर्ज़ नहीं चुका पाती. बीच के फासले और फसीलें इतनी लंबी और चौड़ी हो गई हैं कि उन्हें पीढियां फांद नहीं पाती. एक छत के नीचे दो प्राणी अजनबियों की तरह रहते हैं.

     यह भी इस जीवन यात्रा का एक दौर है, एक पड़ाव है. यादों के अंबार कई दिलों  के तहखानों में दबे हैं. कुछ पल के लिए कभी कोई खिड़की खुलती है तो कभी कोई. यादें जब सांसो में कुछ पल लहलहाने लगती हैं तो लगता है उन यादों के पालने में फिर से जिंदगी झूला झुला रही है. हाँ जीवन एक झूला ही तो है, जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक का.

 

***

 

3/26/2026

औरत ने जन्म दिया मर्दों को

 औरत ने जन्म दिया मर्दों को

जन्मदातिनी है औरत, अपने गर्भ की उपज की

उस कन्या की जो कल माँ बनेगी

उस मर्द की, जो बेटा बनकर, बाप बनेगा  

क्यों वह भूल जाता है इस सच को-

कि नारी जीती है, पर उसका  

पालन करते हुए कितनी बार मरती है

इस सृष्टि के निर्माण के लिए

जो उसकी कोख में सीप में मोती सा समाया रहता है   

क्यों नहीं दे पाता है उसे वह मान-सन्मान

जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है

क्यों वह सोचने की गलती कर बैठता है

वह सिर्फ़ व् सिर्फ़ नारी बस बच्चों की माँ है

और उसके घर की रखवाली की मात्र चौकीदारिनी

क्यों उसकी आशाओं, इच्छाओं को अपने स्वार्थ के चौखट पर

बार बार बलि पर चढाने की पहल करता है

क्यों वह भूल जाता है, कि वह जिंदा है,

सांस ले रही है, आग उगल सकती है.

नहीं! सोच भी कैसे सकता है वह,                                                                                            जो अपने ही स्वार्थ की इच्छा के

सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहा है 

गंद दुर्गंध उनकी सांसों में मांसभक्षी प्रवृती व्यापित करती है

वही तो हैं, जो उसके तन को गोश्त समझकर

दबोचते, चबाते, निगलते स्वाद लेता है

भूल जाता हैं कि कभी वह गले में 

फांस बनकर अटक भी सकती है!

अलविदा ऐ साथी

 

अलविदा ऐ साथी

फ़रेबी फ़ितरत के तुम वारिस 

 मैं शातिरता से हूँ नावाकिफ़ 

 खुद को लुटा कर अब सीखी हूँ 

और विश्वास के साथ कहती हूं

तुम अपनी दुनिया बसाओ

 मैं अपनी फना करूं

 अपना अंत लाकर उस वजूद के साथ

 समस्त कायनात का खात्मा करूं 

 अपने ही वारिस को अपनी कोख में

 दफ़ना कर, खुद को फ़ना करूं 

अभी तक विश्वास नहीं आता

कि मेरी कोख में

मेरे और तेरे बच्चे के भ्रूण में

मेरे और पराए खून की मिलावट है

हां तुमने कहा था, और मैंने सुना था

मेरे विश्वास पर यह

तुम्हारे विश्वासघात का वार था

सच कहती हूँ

वह तुम्हारा ही बच्चा है

तुम कहते होनहीं

 सच क्या है, तुम भी जानते हो और मैं भी

 पर अबमैं खुद मुख्तियार हूँ 

तुम्हारी याद की कोई भी निशानी

न अपने पास, और न इस धरती पर

छोड़ना चाहती हूँ 

अलविदा ऐ साथी 

मैं अपने आप को फ़ना कर के

इस समस्त कायनात का खात्मा करूंगी

मेरे भीतर धड़कते हुए उस वारिस का

वजूद मिटाकर, अपनी ही कोख में दफ़ना कर

साथ उसके फना हो जाऊंगी.

 देवी नागरानी

 

3/22/2026

अगर तुम समझते हो


अगर तुम समझते हो, कि

तुमने मुझे जंजीरों में जकड़ लिया है

तो गलत समझा है

मत समझो कि मैं

तुम्हारी चाल के चंगुल से            

खुद को आज़ाद कराने के रास्ते

अपने पीछे बंद कर आई हूँ.

यह तुम्हारी नादानी होगी!

इतनी नादां तो मैं नहीं, 

जो अपनी आज़ादी को

तुम्हारी रीति--रस्मों के खूंटे से बाँध आऊँ, और

उस ताले की चाबी तुम्हें सौंप 

गुलामी की ज़ंजीरें पहन लूँ!

वह चाबी तब भी मेरे पास थी

अब भी मेरे पास है,

अरसा हुआ इस्तेमाल करके

 

कुछ जंग ज़रूर लग गई उसे 

पर है तो वही चाबी,

यह भी जानती हूँ मैं

जो चाबी ताला बंद करती है

वही उसे खोलती भी है!


 

कोई नारी मन से पूछे

 

त्रस्त हुई मानवता कितनी, कोई नारी मन से पूछे

हद है कितनी दानवता की,  कोई नारी मन से पूछे

बेघर निर्वासित सी नारी, फिरती क्यों है मारी-मारी
बाहर-भीतर क्यों है भटकी, कोई नारी मन से पूछे

बाहर की लौ जगमग-जगमग, भीतर के क्यों जली बुझी है                                                              मन में घोर अमावस कैसी कोई नारी मन से पूछे         
                               

कड़वे बोल का विष है बरसे, मीठे बोल को पल पल तरसे                                                              जली कटी वो कितना सुनती कोई नारी मन से पूछे                     

घुट घुट कर वो मरती है, मर-मर कर वो जीती है                                                                   आहों में चिंगारी सुलगी,  कोई नारी मन से पूछे पूछे.

जीवन शैया पर होता है,  दाह दामिनी का नित देवी

कितना जीती, कितना  मरती, कोई नारी मन से पूछे


 

आई है ख़ुशियों की भोर

मस्त फ़िजाँ मेँ भीनी भोर

ख़ुशबू देती चारों ओर

 

बादल गरजे घनघन घन घन

छाई घटा कारी घन घोर

 

रिमझिम रिमझिम पानी बरसे

प्यासा मोर मचाए शोर

 

कळ कळ कळ कळ पानी बहता

प्यास बुझाए प्यासे ढोर

 

ऊँची उड़ान भरे मन ऐसे

जैसे पतँग की कोई डोर

 

मदमाती मस्ती है देवी

आई है ख़ुशियों की भोर