Pages

4/01/2026

zARD PATTE

 

Showing posts with label Vichaar-ManthanShow all posts

3/28/2026

भीतर के शोर में गुम

  आज मेरे भीतर कितनी खामोशी हैकितना सन्नाटा हैपहले ऐसा तो नहीं होता था

 वह बिछड़ गयाबस गया...कोई सुराग नहीं जहां से उसके लौट आने की खबर मिले. बड़े-बड़े दावे करना आसान है पर पूरा उतरना युग की सबसे बड़ी विडंबना है.

           सभी  जी लेते हैं, कोई भी किसी के साथ नहीं मरता. बेचैनी और बेसुकूनी से घिरा इंसान जज्बाती हो कर सख्त फैसला नहीं कर सकता. हर चीज का हिसाब किताब होता हैपर यकीनन वह गरीब के हिस्से में कुछ ज़ियादा होता है. अमीर गरीब दोनों जिंदा रहते हैंअपनी-अपनी परीधियोंसुविधाओं और असुविधाओं की मयार मेंपर कब्र तक पहुंचते-पहुंचते सब बराबर हो जाते हैं. अंत सभी का एक सा कोईकोई फर्क नहीं... कोई गरीब नहीं कोई अमीर नहीं... सब बराबर.

           गरीब के घर कच्चे होते हैं जहां में रहते हैंऔर मौसमों के थपेड़ों से उनके घर डह भी जाते हैं. अमीरों के घर मजबूत होते हैं और वे अमीरों की शान शौकत की रिवायतों का पालन करते हुए बरकरार रहते हैं. इन मजबूत ईंटों में दरारों के रूप में मौसमों के रवैये से तब्दीलियां आती तो हैं, पर दिखाई कम देती है.

            लेकिन कच्चे घरों में कुछ मजबूरियां भी पलती हैं. मजबूरियां कब आज़माइशों में बदल जाती है पता ही नहीं पड़ता. चलते चलते कहीं रुक जाना पड़ता है. कभी कदम आगे बढ़ाने के लिए पिछले क़दम का त्याग करना पड़ता है. पिछड़ी हुई जिंदगानियों के लिए कुछ करने के लिए उनके हित में इंसाफ लाजमी है और सबसे अहम उनके लिए इनके दरवाज़ों का खुलना जरूरी है, जहां से होकर रोशनी उनके जहन को कुछ रौशन कर पाए.

           दिन को हमें तारे नहीं दिखाई देतेइसका मतलब यह नहीं कि आसमान में तारे ही नहीं. बस हमें सारा दिन गुजर जाने का इंतजार करना पड़ता है.

 **

3/27/2026

जीवन एक यात्रा

 





मेरी जीवन यात्रा

उस पथिक जैसी है

जो ऊबड़ खाबड़ पगडंडियों पर 

अपने सामने उन अदृश्य पद चिन्हों पर

चलते हुए विश्वास से क़दम बढ़ा रहा है

कि कोई उसका मार्गदर्शक है

जो उसके आगे चल रहा है

देवी नागरानी

 

जीवन एक यात्रा (विचार मंथन)


मैं मात्रा मिट्टी वह भी कच्ची

एक वही कुम्भारजो मिटटी को सोना बना देता है

 

(करोना काल में आँखों के आगे रक्स करती स्मृतियाँ-जो जाने किन खलाओं में धंस गई थींअब एक एक करके सतह पर बिन बुलाये आ ही जाती है..शायद फिर से सांस लेकर इस काल के अंतिम पहर के साथ घुल मिल जाने के लिए...)

 

कहते सुना है और वक्त के साथ यह सच दोहराया भी जाता है-आत्मा अमर हैशरीर एक आवरण है जो बदलता रहता है. अगर वह शरीर मैं नहीं तो कौन है जिसका मैं आवरण हूँरूमी के दार्शनिक पहलुओं में कई जवाबों के बावजूद, अनेक सवाल फिर भी मंडराते रहते हैं.

जीवन भी तो एक यात्रा हैलंबी यात्राइस छोर से उस छोर तक. जिसमें पल्लवित होकर जीते हैं अहसासभावनाएंजज्बातप्यारदुलार, स्नेह के सौ-सौ स्वरूप. धीरे धीरे सब बदल जाता हैमौसमों की तरहबहारों से खिज़ां तक का सफर करते हुए सूखे चरमराए ज़मीन पर पड़े पत्तों की तरह.

     जीवन वाक़ई एक जंग हैता-उम्र जूझनालड़ना और अंत में ठहराव के पहले मौत की फतह का परचम फहराना.  जन्म के वक्त पता ही नहीं पड़ता कि जन्मदातिनी कौन है और मौत के समय पता नहीं पड़ता कि कब्र में किसने लिटायाजन्म पर किसने जश्न मनाया और मौत पर किसकी रुदादी चीख उठी. तब माँ की शीतल कोख थी अब धरती माँ की ठंडी गोद नसीब होती है.

अब जीवन को माप-तोलकर जीना तो उसका अंत लाने जैसा है. क्या कभी हवाओं को बिना मरज़ी रुख बदलते देखा हैजहां-जहाँ रुख हुआमुंह उठाकर चल दीं. आज मानवता भी हवाओं की मानिंद दिशाएं व् दशाएं बदलती जा रही है.

     साक्षात सच है तो बस मौत’. आए दिन देखते हैं खुली आंखों सेसुनते है अपने ही कुनबे सेकितने जन सब छोड़-छाड़ कर चले गएपर लगता है फिर भी सब सपना सा हैभ्रम है जो टूटने का नाम नहीं लेता. अंत तकजीने की लालसा हमारे हिस्से में हैमृत्यु औरों के लिए और तो और जब अपना कोई दिल से जुदा हो जाता है तो उनके जाने का गम हमें दिन रात सालता है. घर मेंदिल में एक खालीपन भर जाता है जिसे कभी कोई और रिश्ता-नाता भर नहीं पाता.

     जब गुलशन में रहते हुए सतरंगी सुमन मुरझा जाएं तो यकीनन बागबाँ के दिल के किसी कोने में कुछ टूटता है. वह जो फूलों को औलाद की  मानिंद सींचता हैकली से फूल बनते देखता है और उनका अंत देखिए! ज़ालिम वक़्त क्या कहर बरपा कर जाता हैबावजूद इसके बाज़ारवाद का परचम बुलंदियों पर फहराया जा रहा है. पुराने ज़माने के कथा किस्सों में रिश्तों के निर्वाह निर्वाह का मापदंड जो भी थाआज के समय से और थाजिनकी गवाहियां साहित्य में दर्ज कहानियां व उपन्यास के अंश देते हैं.  सिन्धी साहित्य सेवी नारायण भारती जी की कहानी दस्तावेज में किरदार को क्लेम के कागज़ रद्द करने पड़े,  ताकि पैसे मिलने पर उस पार बसे हुए लोगों को फिर से उजड़ना न पड़े. कहींकिसी कारणवश वह बाल-बच्चों वाला बंदा घर से बेघर न हो जाए. कागज़ फाड़ने का सबब एक ही था.’ घर जाएगा तो परिवार टूट जाएगा, बच्चे लावारिस हो जाएंगे.’ यह परिवार के संगठन को संगठित करने की सोच उस समय थीइस समय तकाज़े कुछ और हैंहकीक़तें कुछ और हैं. सब का बंटवारा होने लगा है. बागबां’ फिल्म इसी आधार की एक हकीकी जीवन गाथा आज हज़ारों घरों के बागबाँ’ खुद निराधार होते चले जा रहे हैं. उनके लिए जीते जी स्वर्ग धामवृद्धाश्रम, आनंदश्रमअपना घरनाम से विशेष आकर्षक स्थान बनाए जा रहे हैं. आज की पीढ़ी अपनी औलाद का फर्ज़ तो पूरा कर सकती हैपर अपने माँ-बाप का कर्ज़ नहीं चुका पाती. बीच के फासले और फसीलें इतनी लंबी और चौड़ी हो गई हैं कि उन्हें पीढियां फांद नहीं पाती. एक छत के नीचे दो प्राणी अजनबियों की तरह रहते हैं.

     यह भी इस जीवन यात्रा का एक दौर हैएक पड़ाव है. यादों के अंबार कई दिलों  के तहखानों में दबे हैं. कुछ पल के लिए कभी कोई खिड़की खुलती है तो कभी कोई. यादें जब सांसो में कुछ पल लहलहाने लगती हैं तो लगता है उन यादों के पालने में फिर से जिंदगी झूला झुला रही है. हाँ जीवन एक झूला ही तो हैजन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक का.

 

***

 

माँ ने कहा था

मैं गाड़ी के नीचे आते आते

बच गई थी!

तब मैं छोटी थी....

और

माँ ने यह भी कहा था

आने वाले कल में

ऐसे कई हादसों से

मैं खुद को बचा लूँगी

जब मैं बड़ी हो जाऊँगी.....

पर

कहाँ बचा पाई मैं खुद को

उस हादसे से?

दानवता के उस षड्यंत्र से?

जिसने छल से

मेरे तन को, मेरे मन को

समझकर एक खिलौना

खेलकर, तोड़-मरोड़ उसे -

फेंक दिया वहाँ,

जहाँ कोई रद्दी भी नहीं फेंकता!

उफ़!

बीमार मानसिकता का शिकार

वह खुद भी,

ज़िन्दा रहने का सबब ढूँढता है!

सच तो यह है

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं होता!

 

याद आया

माँ ने ये भी कहा था

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं होता !