ग़ज़लः
राजनीति साज़िशों की कब समझ में आएगी
चालबाज़ी
शोरिशों
की
कब
समझ
में
आएगी
किस लिये टकराव
है
ये
आज
इन्सानों
के
बीच
बात
बेजा
रंजिशों
की
कब
समझ
में
आएगी
ख़ाली होने से
ही
पहले
वो
कुआँ
भर
जाएगा
बेपनाही
ख़्वाइशों
की
कब
समझ
में
आएगी
छत टपकती है
अभी
गीले
दरो-दीवार
हैं
ये
तबाही
बारिशों
की
कब
समझ
में
आएगी
क्यों शरारे आसमां
की
सिम्त
बढ़
जाने
को
हैं
यह
नुमाइश
जुगुनुओं
की
कब
समझ
में
आएगी
कर रहे हैं
पासबां
सौदे
शराफ़त
के
बहुत
सादगी
इन
साज़िशों
की
कब
समझ
में
आएगी
हाथ की रेखाओं
से
हम
किस
क़दर
मजबूर
हैं
बेबसी
इन
गर्दिशों
की
कब
समझ
में
आएगी...


