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4/10/2026

उत्पादन का ज़माना

 

अर्थ शास्त्र का अर्थ है उत्पादन!

सभी को उत्पादक होना है

वर्ना फिज़ूल है अस्तित्व!

समय से समय निकालकर

इन फिज़ूल अस्तित्व वालों को

समय देना भी

फिज़ूल ख़र्ची मानी जाती है,

समय का सदुपयोग है उत्पादन में

जहाँ संसार भर की सुविधाएँ

उपलब्ध हों, लेकिन

उनका भोग करने के लिए

किसी के पास समय न हो!

यह कैसा अर्थशास्त्र है

जिसके अर्थों में

अनर्थों की संभावना पनप रही है

परिवार नामक संस्था की

नींव रखने वाले निर्वासित हो रहे हैं

ऐसे में घरों में सन्नाटा बस गया है

बूढ़े कहीं दिखाई नहीं देते!

जवानी की दहलीज़ पार करते ही

एक अवस्था आती है जीवन में

जहाँ आदमी न जवान रहता है, न बूढ़ा

यह उसी समय की व्यथा है--

उत्पादन का न होना।

जवान बड़े होते हैं,

बूढ़ों को बूढ़ा होने के पहले,

बूढ़ा करार दिया जाता है

नौजवान, उनके लिए स्थापित किए गए

वृद्धाश्रम में उन्हें छोड़ आते हैं,

वहीं, जहाँ उन्हें

अपना कल महफ़ूज नज़र आता है।

अब सोचिए,

नव पीढ़ी के इस सोच का आविष्कार

क्या क्या न देगा,

आने वाले कल के वारिसों को

जब घर में बूढ़े न होंगे?

कौन सुनाएगा उन बच्चों को

वे लोरियाँ, जो

सपनों के संसार से उन्हें जोड़ती हैं,

वो बचपन के किस्से...

तोता मैना की कहानी...

वो बाबा की बातें...

वो अम्मा की लोरी...

वो गायत्री मंत्र का पाठ,

घर आँगन में तुलसी का रोपना...

और...

हनुमान चालीसा का दोहराया जाना...

सभी कुछ तो छूट जाएगा

समय की तंग गलियों में खो जाएगा

और ऐसे संकीर्ण जीवन के

सूत्रों से जुड़कर आदमी

असमय ही, जीवन जीने के पहले

बूढ़ा हो जाएगा।

पर,

कोई क्या कर सकता है 

इस उत्पादन के ज़माने में?

यह वक़्त की मांग है

अपने ही स्थापित किए हुए वृद्धाश्रमों में

उन्हें जाना होगा......

आश्रय लेना होगा!

देवी नागरानी

 

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