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4/09/2026

साँस ले रही है

 हाहाकार मचा हुआ है

उस राख के ढेर तले

जहाँ,

जलकर भी नहीं जली

वो जिंदा लाशें, जिनकी उभरती आहें

वो सिसकियाँ, दब गयीं उस राख तले 

शायद

मुर्दा लोग पूरी तरह से मरे नहीं, 

उनमें जिंदा थी जीने की चाह

ऊपर उठने की चाह, पर

बेमौत मारे गए,

बेरहम शिकंजों के शिकार बन गए,

दफ़नाये गए और साथ उनके,

दफ़नाया गया

उनका प्यार, उनका दर्द, उनकी आशाएं

सभी राख के तले,

और अब वे बेक़रार हैं

उस मलबे से ऊपर उठने के लिए!

हवाओं में एक ख़ामोश शोर है

एक हलचल है,

जैसे वे खामोश सिसकियाँ

राख के तले अब भी

सांस ले रही हैं



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