यह कैसी विडम्बना है?
मेरे चाहने पर भी, कोई
खुली आँखों से देखता नहीं
मेरी छटपटाहट महसूस करता नहीं।
क्यों कोई,
मेरे भीतर झांक नहीं पाता?
कहीं ऐसा तो नहीं मैंने ख़ुद
अपने दिल का दरवाज़ा भीतर से
भींच लिया है और नज़रबंद कर
लिया है
खुद को अपनी तनहाइयों के साथ,
जो घर बसाकर बैठी हैं मेरे भीतर
शायद, इस इंतज़ार में
कि एक न एक दिन
मैं दुनिया के शोर से
बेज़ार होकर, बेताबी से
अपने ही भीतर
उस बंद दरवाज़े पर दस्तक दूँ,
और
पल भर में मेरी तन्हाइयाँ
बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे
मुझे अपने आलिंगन में भर लें!
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