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3/26/2026

औरत ने जन्म दिया मर्दों को

 औरत ने जन्म दिया मर्दों को

जन्मदातिनी है औरत, अपने गर्भ की उपज की

उस कन्या की जो कल माँ बनेगी

उस मर्द की, जो बेटा बनकर, बाप बनेगा  

क्यों वह भूल जाता है इस सच को-

कि नारी जीती है, पर उसका  

पालन करते हुए कितनी बार मरती है

इस सृष्टि के निर्माण के लिए

जो उसकी कोख में सीप में मोती सा समाया रहता है   

क्यों नहीं दे पाता है उसे वह मान-सन्मान

जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है

क्यों वह सोचने की गलती कर बैठता है

वह सिर्फ़ व् सिर्फ़ नारी बस बच्चों की माँ है

और उसके घर की रखवाली की मात्र चौकीदारिनी

क्यों उसकी आशाओं, इच्छाओं को अपने स्वार्थ के चौखट पर

बार बार बलि पर चढाने की पहल करता है

क्यों वह भूल जाता है, कि वह जिंदा है,

सांस ले रही है, आग उगल सकती है.

नहीं! सोच भी कैसे सकता है वह,                                                                                            जो अपने ही स्वार्थ की इच्छा के

सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहा है 

गंद दुर्गंध उनकी सांसों में मांसभक्षी प्रवृती व्यापित करती है

वही तो हैं, जो उसके तन को गोश्त समझकर

दबोचते, चबाते, निगलते स्वाद लेता है

भूल जाता हैं कि कभी वह गले में 

फांस बनकर अटक भी सकती है!

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