कभी तो होगा....
दामिनी के दर्द का अहसास
उन धड़कते दिलों को
यक़ीनन आज नहीं तो कल
आने वाले कल में, या
होगा तब जब उनकी अपनी माँ -बहन
बेटी बहू या बीवी खुद
रेंगती हुई छटपटाएगी
उन शिकंजों के चंगुल में,
जो पाठ मानवता का
कभी पढ़ नहीं पाये, जिनके
दूध में और ख़ून में शायद
कभी इंसानियत घुल ही न पाई!
क्या समझेंगे वे पीड़ा नारी के
अपमान की
निर्वस्त्र जब उसकी परतें हुईं
बेलिबासी जिस्म ने जब ओढ़ ली।
कोई पांडव, कृष्ण कोई अंग-वस्त्र न ला सका!
कोई सुन न पाया उस उबलते लहू की
पुकार
जो किसी दुखियारी माँ की बद्दुआ
की चीख बनी
जो आग के बदले, आहों को उगलती रह गई
और उगलती ही रहेगी उस समय तक, जब तक
उस आह के उगले पिघलते लावा में
धंस न जाएगी दरिंदगी,
दर्द की उस बाढ़ में तब तक
नहाएगी गंदगी.
तब अहसास होगा, ज़रूर होगा
उन्हें, दामिनी के इस दर्द का
जो ज़िंदगी में जीते जी दाह पर
आह भरती रह गई!
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