त्रस्त हुई मानवता कितनी, कोई नारी मन से पूछे
हद है कितनी दानवता की, कोई नारी मन
से पूछे
बेघर निर्वासित सी नारी, फिरती क्यों है मारी-मारी
बाहर-भीतर क्यों है भटकी, कोई नारी मन से पूछे
बाहर की लौ जगमग-जगमग, भीतर के क्यों जली बुझी है मन में घोर अमावस कैसी, कोई नारी मन से पूछे
कड़वे बोल का विष है बरसे, मीठे बोल को पल पल तरसे जली कटी वो कितना सुनती, कोई नारी मन से पूछे
घुट घुट कर वो मरती है, मर-मर कर वो जीती है आहों में चिंगारी सुलगी, कोई नारी मन से पूछे पूछे.
जीवन शैया पर होता है, दाह दामिनी का नित ‘देवी’
कितना जीती, कितना मरती, कोई नारी मन से पूछे

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