आज मेरे भीतर कितनी खामोशी है, कितना सन्नाटा है, पहले ऐसा तो नहीं होता था
वह बिछड़ गया, बस गया...कोई सुराग नहीं जहां से उसके लौट आने
की खबर मिले. बड़े-बड़े दावे करना आसान है पर पूरा उतरना युग की सबसे बड़ी विडंबना
है.
सभी जी लेते हैं, कोई भी किसी के साथ नहीं मरता. बेचैनी
और बेसुकूनी से घिरा इंसान जज्बाती हो कर सख्त फैसला नहीं कर सकता. हर चीज का
हिसाब किताब होता है, पर यकीनन वह गरीब के हिस्से में कुछ ज़ियादा होता
है. अमीर गरीब दोनों जिंदा रहते हैं, अपनी-अपनी परीधियों, सुविधाओं और असुविधाओं की मयार में, पर कब्र तक
पहुंचते-पहुंचते सब बराबर हो जाते हैं. अंत सभी का एक सा कोई, कोई फर्क नहीं... कोई गरीब नहीं कोई अमीर नहीं... सब बराबर.
गरीब के घर कच्चे होते हैं जहां में रहते हैं, और मौसमों के
थपेड़ों से उनके घर डह भी जाते हैं. अमीरों के घर मजबूत होते हैं और वे अमीरों की
शान शौकत की रिवायतों का पालन करते हुए बरकरार रहते हैं. इन मजबूत ईंटों में
दरारों के रूप में मौसमों के रवैये से तब्दीलियां आती तो हैं, पर दिखाई कम देती
है.
दिन को हमें तारे नहीं दिखाई देते, इसका मतलब यह नहीं कि आसमान में तारे ही नहीं.
बस हमें सारा दिन गुजर जाने का इंतजार करना पड़ता है.
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