सोच का जंगल भी,
किसी सियासत से कम नहीं,
कभी तो ताने-बाने बुनकर
एक घरौंदा बना लेता है
जहाँ उसका अस्तित्व आश्रय पा
जाता है,
या, फिर कहीं
अपनी ही असाधारण सोच के
नुकीलेपन से
अपना आशियाँ उजाड़ देता है।
जब होश आता है, तब उसे लगता है
पांव तले धरती नहीं,
और वह छत भी नहीं,
जो एक चुनरी की तरह
ढांप लेती है उसका मान सम्मान!
मन की सियासत, उफ़!
यह सोच भी शतरंज की तरह
कुछ यूँ बिछ जाती है
बस, उसूलों की पोटली भरकर
हम एक तरफ़ रख देते हैं
और
सियासत के दायरे में
पाँव पसार लेते हैं
जहाँ आवरण तो नसीब होता है, पर
वह छत नहीं मिलती,
जो स्वाभिमान को महफूज़ रख पाये
ज़मीर को जिंदा रखकर जीवन
प्रदान करे
वह छत,
जिसकी छत्र छाया में
सच पलता है
वह मिलकर भी नहीं मिलती !
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