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4/01/2026

मेरी यादों का आकाश

मेरी यादों के आकाश तले

दबी हुई है मेरे ज़मीर की धरती

थक चुकी है, बोझ उठाकर

अपने जेहन के आँचल पर

झीनी चुनरिया जिसकी

तार-तार हुई है

उन दरिंदों के शिकंजों से

उन खूंखार नुकीली नज़रों से, जो

शराफ़त का दावा तो करते हैं, पर

दुश्वारियों को खरीदने का

सामान भी रखते हैं।

बिक रहा है ज़मीर यहाँ

बस बची है अंगारों के नीचे

दबी हुई कुछ राख़ मेरे

ज़िन्दा जज़्बों की

जो धाँय धाँय उड़कर

काला स्याह कर रही है

मेरे यादों के आकाश को


 

6 comments:

Anita said...

पीड़ा के इस सागर को बहना होगा, हर शोषित को दुख अपना कहना होगा

M VERMA said...

Wahhh

सुशील कुमार जोशी said...

वाह

Devi Nangrani said...

दिल से धन्यवाद शवेता जी. लिकं भेजिए please.

Devi Nangrani said...

धन्यवाद आपका

Devi Nangrani said...

धन्यवाद आपका