जीवन के तट पर-मेरे मन की सइरा में सफ़र करते जब मेरे पाँव थक जाते हैं तब कलम का सहारा ले कर शबनमी सपने बुनने लगती हूँ. प्यास की आस बंध जाती है, सफर बाकी कुछ और.... सिर्फ थोड़ा और.....
3/28/2026
भीतर के शोर में गुम
आज मेरे भीतर कितनी खामोशी है, कितना सन्नाटा है, पहले ऐसा तो नहीं होता था
वह बिछड़ गया, बस गया...कोई सुराग नहीं जहां से उसके लौट आने
की खबर मिले. बड़े-बड़े दावे करना आसान है पर पूरा उतरना युग की सबसे बड़ी विडंबना
है.
सभी जी लेते हैं, कोई भी किसी के साथ नहीं मरता. बेचैनी
और बेसुकूनी से घिरा इंसान जज्बाती हो कर सख्त फैसला नहीं कर सकता. हर चीज का
हिसाब किताब होता है, पर यकीनन वह गरीब के हिस्से में कुछ ज़ियादा होता
है. अमीर गरीब दोनों जिंदा रहते हैं, अपनी-अपनी परीधियों, सुविधाओं और असुविधाओं की मयार में, पर कब्र तक
पहुंचते-पहुंचते सब बराबर हो जाते हैं. अंत सभी का एक सा कोई, कोई फर्क नहीं... कोई गरीब नहीं कोई अमीर नहीं... सब बराबर.
गरीब के घर कच्चे होते हैं जहां में रहते हैं, और मौसमों के
थपेड़ों से उनके घर डह भी जाते हैं. अमीरों के घर मजबूत होते हैं और वे अमीरों की
शान शौकत की रिवायतों का पालन करते हुए बरकरार रहते हैं. इन मजबूत ईंटों में
दरारों के रूप में मौसमों के रवैये से तब्दीलियां आती तो हैं, पर दिखाई कम देती
है.
दिन को हमें तारे नहीं दिखाई देते, इसका मतलब यह नहीं कि आसमान में तारे ही नहीं.
बस हमें सारा दिन गुजर जाने का इंतजार करना पड़ता है.
भूख
भूख.एक बीमारी, एक लाचारी है
यह एक नग्न अहसास है, जो
औरों के मुंह से निवाला तो छीन
लेती है
लेकिन अपना पेट नहीं भर पाती.
गुरबत को निगल कर भी
डकार तक नहीं लेती ...
शायद उसकी हालत
उस कंगाल से भी बदतर है
जो भूख के लिए भीख तो मांगता है, लेकिन
अपनी ही हवस की भूख के आगे
लाचार, मोहताज हो, घुटने टेककर
बीते पलों से
अपने ही जीवन की भीख माँगता
फिरता है
और वे पल,
शायद उसकी हवस की भूख का
पेट न भर पाए...
3/27/2026
बदनाम औरत
बदनाम औरत
बालक की कोख से जन्मी नारी
एक माँ, एक बहन, बेटी, बीवी,
और एक दाई माँ भी...
हाँ, वही दाई माँ
जो थी तो औरत, पर
जच्चा की अनचाही मुराद के आगे
कुछ सिक्कों की खातिर
न जाने क्यों
बच्चे के गले पर अंगूठे का दबाव
बढ़ाते हुए
उसकी साँसों को घोंट देती है
हाय बेरहम,
नारी को कलंक लगाया
उस मासूम को मौत के घाट उतारा
जिसने खुली आँख से
दुनिया को नज़र भर देखा भी न था.
अब जाना, क्यों औरत बदनाम हुई है.
जब वह कैकेई बनी,
जब वह मंथरा बनी,
वही अब दाई बनकर आई है।
जीवन एक यात्रा
मेरी जीवन यात्रा
उस पथिक जैसी है
जो ऊबड़ खाबड़ पगडंडियों पर
अपने सामने उन अदृश्य पद चिन्हों पर
चलते हुए विश्वास से क़दम बढ़ा रहा है
कि कोई उसका मार्गदर्शक है
जो उसके आगे चल रहा है
देवी नागरानी
जीवन एक यात्रा (विचार मंथन)
मैं मात्रा मिट्टी , वह भी
कच्ची
एक वही कुम्भार, जो मिटटी को सोना बना देता है
(करोना काल में आँखों के आगे रक्स करती
स्मृतियाँ-जो जाने किन खलाओं में धंस गई थीं, अब एक
एक करके सतह पर बिन बुलाये आ ही जाती है..शायद फिर से सांस लेकर इस काल के अंतिम
पहर के साथ घुल मिल जाने के लिए...)
कहते सुना है और
वक्त के साथ यह सच दोहराया भी जाता है-‘आत्मा
अमर है, शरीर एक आवरण है जो बदलता रहता है. अगर वह शरीर
मैं नहीं तो कौन है जिसका मैं आवरण हूँ? रूमी के दार्शनिक पहलुओं में कई जवाबों के बावजूद, अनेक सवाल फिर भी मंडराते
रहते हैं.
जीवन भी तो एक
यात्रा है, लंबी यात्रा, इस छोर से उस छोर तक. जिसमें पल्लवित होकर जीते हैं अहसास, भावनाएं, जज्बात, प्यार, दुलार, स्नेह के सौ-सौ स्वरूप. धीरे
धीरे सब बदल जाता है, मौसमों की तरह, बहारों से खिज़ां तक का सफर करते हुए सूखे चरमराए ज़मीन पर
पड़े पत्तों की तरह.
जीवन वाक़ई एक जंग है, ता-उम्र जूझना, लड़ना और अंत में ठहराव के पहले मौत की फतह का परचम फहराना. जन्म के वक्त पता ही
नहीं पड़ता कि जन्मदातिनी कौन है और मौत के समय पता नहीं पड़ता कि कब्र में किसने
लिटाया? जन्म पर किसने जश्न मनाया और
मौत पर किसकी रुदादी चीख उठी. तब माँ की शीतल कोख थी अब धरती माँ की ठंडी गोद नसीब
होती है.
अब जीवन को
माप-तोलकर जीना तो उसका अंत लाने जैसा है. क्या कभी हवाओं को बिना मरज़ी रुख बदलते
देखा है? जहां-जहाँ रुख हुआ, मुंह उठाकर चल दीं. आज मानवता भी हवाओं की मानिंद दिशाएं व्
दशाएं बदलती जा रही है.
साक्षात सच है तो बस ‘मौत’. आए दिन देखते हैं खुली आंखों से, सुनते है अपने ही कुनबे से, कितने जन सब छोड़-छाड़ कर चले गए, पर लगता है फिर भी
सब सपना सा है, भ्रम है जो टूटने का नाम नहीं लेता. अंत तक, जीने की लालसा हमारे हिस्से में है, मृत्यु औरों के लिए ! और तो और जब अपना कोई दिल से जुदा हो जाता है तो उनके जाने का गम हमें दिन रात
सालता है. घर में, दिल में एक खालीपन भर जाता है जिसे कभी कोई और
रिश्ता-नाता भर नहीं पाता.
जब गुलशन में रहते हुए सतरंगी सुमन मुरझा जाएं तो यकीनन
बागबाँ के दिल के किसी कोने में कुछ टूटता है. वह जो फूलों को औलाद की मानिंद सींचता है, कली से फूल बनते देखता है और उनका अंत देखिए! ज़ालिम वक़्त क्या कहर बरपा कर
जाता है? बावजूद इसके बाज़ारवाद का परचम
बुलंदियों पर फहराया जा रहा है. पुराने ज़माने के कथा किस्सों में रिश्तों के
निर्वाह निर्वाह का मापदंड जो भी था, आज के समय से और था, जिनकी गवाहियां साहित्य में दर्ज कहानियां व उपन्यास के अंश
देते हैं. सिन्धी साहित्य सेवी नारायण भारती जी की कहानी ‘दस्तावेज’ में किरदार को क्लेम के कागज़ रद्द करने पड़े, ताकि पैसे मिलने पर उस पार बसे हुए लोगों को फिर से उजड़ना
न पड़े. कहीं, किसी कारणवश वह बाल-बच्चों
वाला बंदा घर से बेघर न हो जाए. कागज़ फाड़ने का सबब एक ही था.’ घर जाएगा तो परिवार टूट जाएगा, बच्चे लावारिस हो जाएंगे.’ यह परिवार के संगठन को संगठित करने की सोच उस समय थी, इस समय तकाज़े कुछ और हैं, हकीक़तें कुछ और हैं. सब का बंटवारा होने लगा है. ‘बागबां’ फिल्म इसी आधार की एक हकीकी जीवन गाथा, आज हज़ारों घरों के ‘बागबाँ’ खुद निराधार होते चले जा रहे
हैं. उनके लिए जीते जी स्वर्ग धाम, वृद्धाश्रम, आनंदश्रम, अपना घर, नाम से विशेष आकर्षक स्थान बनाए जा रहे
हैं. आज की पीढ़ी अपनी औलाद का फर्ज़ तो पूरा कर सकती है, पर अपने माँ-बाप का कर्ज़ नहीं चुका पाती. बीच के फासले और
फसीलें इतनी लंबी और चौड़ी हो गई हैं कि उन्हें पीढियां फांद नहीं पाती. एक छत के
नीचे दो प्राणी अजनबियों की तरह रहते हैं.
यह भी इस जीवन यात्रा का एक दौर है, एक पड़ाव है. यादों के अंबार कई दिलों के तहखानों में दबे हैं. कुछ पल के लिए कभी कोई खिड़की
खुलती है तो कभी कोई. यादें जब सांसो में कुछ पल लहलहाने लगती हैं तो लगता है उन
यादों के पालने में फिर से जिंदगी झूला झुला रही है. हाँ
जीवन एक झूला ही तो है, जन्म से लेकर
अंतिम यात्रा तक का.
***
3/26/2026
औरत ने जन्म दिया मर्दों को
औरत ने जन्म दिया मर्दों को
जन्मदातिनी है औरत, अपने गर्भ की उपज की
उस कन्या की जो कल माँ बनेगी
उस मर्द की, जो बेटा बनकर, बाप बनेगा
क्यों वह भूल जाता है इस सच को-
कि नारी जीती है, पर उसका
पालन करते हुए कितनी बार मरती है
इस सृष्टि के निर्माण के लिए
जो उसकी कोख में सीप में मोती सा समाया रहता है
क्यों नहीं दे पाता है उसे वह मान-सन्मान
जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है
क्यों वह सोचने की गलती कर बैठता है
वह सिर्फ़ व् सिर्फ़ नारी बस बच्चों की माँ है
और उसके घर की रखवाली की मात्र चौकीदारिनी
क्यों उसकी आशाओं, इच्छाओं को अपने स्वार्थ के चौखट पर
बार बार बलि पर चढाने की पहल करता है
क्यों वह भूल जाता है, कि वह जिंदा है,
सांस ले रही है, आग उगल सकती है.
नहीं! सोच भी
कैसे सकता है वह, जो
अपने ही स्वार्थ की इच्छा के
सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहा है
गंद दुर्गंध उनकी सांसों में मांसभक्षी प्रवृती व्यापित
करती है
वही तो हैं, जो उसके तन को गोश्त समझकर
दबोचते, चबाते,
निगलते स्वाद लेता है
भूल जाता हैं कि कभी वह गले में
फांस बनकर अटक भी सकती है!
अलविदा ऐ साथी
अलविदा ऐ साथी
फ़रेबी फ़ितरत के तुम वारिस
मैं शातिरता से हूँ नावाकिफ़
खुद को लुटा कर अब सीखी हूँ
और विश्वास के साथ कहती हूं
‘तुम अपनी दुनिया बसाओ
मैं अपनी फना करूं
अपना अंत लाकर उस वजूद के साथ
समस्त कायनात का खात्मा करूं
अपने ही वारिस को अपनी कोख में
दफ़ना कर, खुद
को फ़ना करूं’
अभी तक विश्वास नहीं आता
कि मेरी कोख में
मेरे और तेरे बच्चे के भ्रूण
में
मेरे और पराए खून की मिलावट
है
हां तुमने कहा था, और मैंने सुना था
मेरे विश्वास पर यह
तुम्हारे विश्वासघात का वार
था
सच कहती हूँ
वह तुम्हारा ही बच्चा है
तुम कहते हो ‘नहीं’
सच क्या है, तुम
भी जानते हो और मैं भी
पर अब, मैं खुद मुख्तियार हूँ
तुम्हारी याद की कोई भी
निशानी
न अपने पास, और न इस धरती पर
छोड़ना चाहती हूँ
अलविदा ऐ साथी
मैं अपने आप को फ़ना कर के
इस समस्त कायनात का खात्मा
करूंगी
मेरे भीतर धड़कते हुए उस
वारिस का
वजूद मिटाकर, अपनी ही कोख में दफ़ना कर
साथ उसके फना हो जाऊंगी.’
देवी नागरानी

