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8/26/2011

हाल अक्सर पूछते थे, क्या हुए



डा. गिरिराजशरण अग्रवाल की एक ग़ज़ल

हाल अक्सर पूछते थे, क्या हुए
लोग जो अच्छे-भले थे, क्या हुए
क्या हुईं वे छाँव वाली शीशमें
पंछियों के घोंसले थे, क्या हुए
अब तो इन शाखों पे कलियाँ तक नहीं
फूल जो कल खिल रहे थे, क्या हुए
दूरियों में कल निकटता शेष थी
वे जो कल तक फ़ासले थे, क्या हुए
फूँकना घर औ’ तमाशा देखना
शहर में कुछ दिलजले थे, क्या हुए
अब से पहली यात्रा में दोस्तो,
सीधे-सीधे रास्ते थे, क्या हुए

8/25/2011

नहीं पत्थर पिघलते हैं




शिवदत्त अक्स की एक ग़ज़ल



यूँ ही आहों की गरमी से नहीं पत्थर पिघलते हैं

चले जब आंधियाँ घर में, नहीं फिर दीप जलते हैं

हुई जब भी मुलाकातें, गले मिल मिल के रोते थे

बड़ी है बेबसी इतनी नहीं अब अश्क ढलते हैं

कभी कागज़ के फूलों पे न भंवरे गुनगुनाते हैं

न शम्अ हो अगर रौशन नहीं परवाने जलते है

वो क्या जानेंगे ये बातें मुहब्बत से जो डरते हैं

वो समझेंगे ये किस्से जो उल्फ़त में मचलते है

जमाना था हमारी राहें इक मंज़िल पे मिलती थी

मिलते अक्स और वो अक्सर नहीं पर साथ चलते हैं



8/24/2011

My God Is so Great



This a the first song that my grandson Yash Nangrani is singing


My God is so great
So strong and so mighty
There is nothing my GOD cannot do
For you, For you!!

6/15/2011

आज और कल

यही वह समय है

जब वक़्त के गलियारे से

गुज़रते हुए

अपने बीते हुए "कल" का किवाड़

अपने पीछे बंद कर दें

और, आने वाले कल को

अपनाने के लिए 'आज' का दरवाज़ा खुला रखें

आज का वक़्त

उस अध्ययन में बिताएं

तो फिर शायद वो ग़लतियां

सामने न आए, जो

कल के किवाड़ के पीछे

हम बंद कर आए हैं.

देवी नागरानी

6/07/2011

अनकही यादें

मूक ज़ुबान


कुछ कहने की कोशिश में

फिर भी नाक़ाबिल रही

नहीं बयां कर पाई उन अहसासों को

जो उमड़ घुमड़ कर

यादों के सागर की तरह

उसकी प्यसी ज़ुबाँ के अधर तक आ तो जाते हैं

पर अधूरी सी भाषा में

वह अनकही दास्तां

बिना कहे, फिर मौन रह जाती है

यह बेबसी है उसके सिये हुऐ लबों की

जो आज़ादी के नाम पर

अब भी दहशतों की गुलामी में

जकड़े हुए हैं.

देवी नागरानी

6/05/2011

आस का दामन

यक़ीन की डोर पकड़ कर

मेरे इस मासूम से मन को

आस का दामन छूने की तमन्ना

अब तक है,

सामने सूरज की रौशनी

आस की लौ बनकर

जगमगा रही है

पर, जाने क्यों?

ज़िंदगी की दल-दल में

विवशता धँसती ही जा रही है

मेरी मुफ़लिसी की,

मेरी अपंगता की

जो मेरी अक्षमताओं का

प्रद्रशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ती

पर सांसें निराशा का दामन

छोड़ कर, आज भी

जीवन का हाथ थाम रही है

शायद उन्हें अपना मूल्य कथने की

आज़ादी है.

6/02/2011

रेती-रेती, साहिल-साहिल

बहता जीवन मेरी मँजिल

बह गई सब आशाएं

निराशाओं की धार में,

भूख, प्यास, चोरी, डाके

सब के सब हथियार गुनह के

कोई कैसे बचे बचाए,

चोर के घर में चोर जाए

कहो कैसे कोई किसे समझाए

देवी नागरानी