जीवन के तट पर-मेरे मन की सइरा में सफ़र करते जब मेरे पाँव थक जाते हैं तब कलम का सहारा ले कर शबनमी सपने बुनने लगती हूँ. प्यास की आस बंध जाती है, सफर बाकी कुछ और.... सिर्फ थोड़ा और.....
8/30/2017
Main Anjaane mein
5/07/2014
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे
ग़ज़ल
कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे
जाने क्या था उसे गिला मुझसे
चंद साँसों की देके मुहलत यूँ
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे
क्या लकीरों की कोई साज़िश थी
रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे
जो भरोसे को मेरे छलता है
वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे
शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो
कह गई अपना हर गिला मुझसे
ऐब मेरे गिना दिये जिसने
दोस्त बनकर गले मिला मुझसे
जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको
ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे
1/08/2014
किस बात का डर
आँखें बंद है मेरी
तीरगी से लिपटा हुआ
मेरा यह मन,
गहरे बहुत, गहरे
धंसता चला जाता है
अपने ही भीतर की खाइयों में,
आखिर थक हार कर जब,
मैं बेबसी में खुद को छोड़ देती हूँ,
तब लगता है मुझे
मैं रोशनी से घिर जाती हूँ ,
फिर मुझे डर नहीं लगता
न जाने किस बात का डर पाल लिया था मैंने
खुद से भी कोई डरता है क्या?
अब मुझे डर नहीं लगता ।
देवी नागरानी
12/19/2013
बेजुबान चीखें
“दिल धड़क उठा, तब
जब,
दिल दहलाती चीख गूंज
उठी
यहीं कहीं, आस-पास
अपने ही भीतर, और
बेसदा सी वह आवाज़
घुटती रही, घुटती रही
पर
मैं कुछ न कर सकी !
“दिल सिसक उठा, तब
जब, जाना
काले बादलों की क़बा भी
उसकी अंग-रक्षक न बन
पाई
बेनाम, बेनंग आदम हमशरीक़ रहे
उस गुनाह में
जिसकी सज़ा आज
मानवता के सर पर
तलवार बन कर लटक रही
है
बाखुदा! उस सज़ा में
नारी का रुआं रुआं
हाज़िरी भर रहा है
आज भी, अभी भी, इस पल भी
पर कोई कुछ नहीं कर
रहा!!
“दिल रोता है
जब आँखें देखती हैं
बेधड़क, बेझिझक घूमती बेहयाई
दिशाहीन वे दरिंदे, साज़िशी गिद्ध बनकर
पाकीज़गी को चीर-फाड़
रहे हैं।
जख्मी जिस्म से निकलती
तेज़ नुकीली चीखें
इन्सानियत की ख़ला में
अपने लाचार पंजे गाढ़
रही है
इस उम्मीद में, हाँ इस उम्मीद में, कि
कोई तो एक होगा
मानवता का अंगरक्षक
जो इन लाखों आवाज़ों के
बीच
सुनकर दिल दहलाती वह
चीख
एक उजड़ती ज़िंदगी को
बचा पाये।
पर हर आस
बेआस होकर लौट रही
है
और
कोई कुछ नहीं कर पा
रहा है!
आज भी चीखें
लटक रही हैं फ़ज़ाओं में
आज भी कासा-ए-बदन
भिखारी की तरह
मांग रहा है
अपने ही भाई-बेटों से
अपनी बेलिबास क़ज़ा के
लिए
एक लजा का कफ़न !
इस आस में, कि शायद
कोई कुछ कर सके!!
9/02/2013
2010 सिन्धी "चेटी चाँद" के अवसर पर
दिनांक १३ मार्च, २०१० रविवार शाम ५.३० बजे आर.डी. नेशनल कॉलेज के ऑडिटोरियम में लायन क्लब ऑफ़ यूनिवर्सिटी काम्पस एवं लायन क्लब ऑफ़ बांद्रा के लायंस श्री अमर मंजाल एवं देवीदास सजनानी के सौजन्य से सिन्धी फिल्म "जय झूलेलाल" दर्शायी गई, वहां फिल्म के मुख्या कलाकार श्री मोहनलाल बेल्लानी(झूलेलाल), कुमार खिलनानी (मिर्ख बादशाह) , एवं रमेश करनानी (झूलेलाल के पिता) अवसर के प्रमुख महमान रहे.
सिन्धी नव वर्ष "चेटी चाँद" के अवसर पर फिल्म "जय झूलेलाल" का उद्घाटन उत्सव एवं देवी नागरानी के सिन्धी काव्य संग्रह "मैं सिंध की पैदाइश हूँ " का लोकार्पण !
चौपाल
चौपाल में
आमने सामने हम खड़े हैं
पहले भी कई बार मिले हैं
मूकता की महफ़िलों में
आस-पास बैठे हैं
बनकर दोनों अजनबी!
और
मैं चाहती हूँ
मैं अनजान ही रहूँ तुम्हारे लिए,
और,
तुम भी मेरे लिए शायद……
पहचान
हर रिश्ते का अंत कर देती है।
पहले भी कई बार मिले हैं
मूकता की महफ़िलों में
आस-पास बैठे हैं
बनकर दोनों अजनबी!
और
मैं चाहती हूँ
मैं अनजान ही रहूँ तुम्हारे लिए,
और,
तुम भी मेरे लिए शायद……
पहचान
हर रिश्ते का अंत कर देती है।
8/24/2013
काला उजाला
वह एक धोबिन
अपनी ही दरिद्रता की
गंदगी में
अमीरी की मैल धोती है।
उस बाहरी उजलेपन को
देखने वाली आँखें
उसके पीछे का मटमैलापन
नहीं देख पातीं।
काश अमीरी भेद पाती
तो यक़ीनन देखती और महसूसती
उस गंदगी की बदबू को
जो वह ओढ़ती रहती है बार-बार
सच मानिए, तब वह ज़रूर
एक उजला रुमाल
अपनी नाक पर ज़रूर धर देती।
देवी
नागरानी
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