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3/21/2026

कर रहा कोई और है

ग़ज़ल -2122 2122 2122 212 

नाम तेरा नाम मेरा कर रहा कोई और है
खालीपन जीवन का हर पल भर रहा कोई और है-1 

क्या मेरी पहचान है, क्या जात क्या औकात क्या 
नेक नामी संग मेरे कर रहा कोई और है-2 

रफ़्ता रफ़्ता चलते चलते नक्शे पा जो भी मिले 
हमक़दम हो हर क़दम पग धर रहा कोई और है-3 

पंख घायल है परिंदा ऊँचा उड़ सकता नहीं 
बेख़बर बेकस वो है, पर बाख़बर कोई और है-4 

जीना मरना जागना सोना लगे सपना मुझे 
मेरे भीतर जीते जी क्यों डर रहा कोई और है-5 

तुम लिखो बिल्कुल लिखो पर यह हक़ीक़त याद हो 
सोच तेरी शब्द उसमें भर रहा कोई और है 

पार कश्ती जो लगाए सब उसे है जानते 
बेख़बर ‘देवी’ मगर रखता ख़बर कोई और है-७ 

12/25/2020

नारी कोई भीख नहीं

नारी कोई भीख नहीं 

न ही मर्द कोई पात्र है

जिसमें उसे उठाकर उंडेला जाता है  

जिसे उलट-पुलट कर देखा जाता है

उसके तन की खुशबू का मूल्य आँका जाता है

खरीदा जाता है, इस्तेमाल किया जाता है

तद पश्चात उसे 

तोड़ मरोड़ कर यूँ फेंका जाता है

जैसे कोई कूड़ा करकट भी नहीं फेंकता.

अब अवस्था बदलनी चाहिए   

अब वे हाथ कट जाने चाहिए

जो औरत को, अपना माल समझकर

आदान-प्रदान की तिजारती रस्में

निभाने की मनमानी करते हैं

सोचिये, सोचिये मत ग़ौर कीजिये

जब औरत वही क़दम उठा पाने की हिम्मत जुटा पाएगी, तब

तोड़ न पाओगे / न मोड़ पाओगे उस हिम्मत को 

जो राख़ के तले                                                                           

चिंगारी बनकर छुपी हुई है /

दबी हुई हैबुझी नहीं है

मत छेड़ोमत आज़माओ,

उसको जो जन-जीवन के /निर्माण का अणु है।

मत बनो हत्यारे /उन जज़्बों केउन अधूरे ख्वाबों के

जो ज़िंदा आँखों में पनपने की तौफ़ीक़ रखते हैं।


देवी नागरानी                                                                                                                                                                                               


नारी-जन्मदातिनी

 मर्द की जन्म्दातिनी है औरत

क्यों वह भूल जाता है इस सच को ---

कि वह जीती है, मरती है 

इस सृष्टि के निर्माण के लिए

जो अपने कोख में समाये हुए है

क्यों नहीं उसे दे पाता है वह मान सन्मान

जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है

क्यों वह सोचने की गलती कर बैठता है

वह सिर्फ़ व् सिर्फ़ उसके बच्चों को माँ है

और उसके घर की रखवाली की मात्र चौकीदारिनी

क्यों उसकी आशाओं, इच्छाओं को अपने स्वार्थ के चौखट पर

बार बार बलि पर चढाने की पहल करता हैं

क्यों वह भूल जाता है, कि वह जिंदा है,

सांस ले रही है, आग उगल सकती है.

नहीं! सोच भी कैसे सकता है वह,                                                       

जो अपने ही स्वार्थ की इच्छा के

सड़े गले बीहड़ में वास करते आ रहा है 

गंद दुर्गंध उनकी सांसों में मांसभक्षी प्रवृती व्यापित करती है

वही तो हैं, जो उसके तन को गोश्त समझकर

दबोचते, चबाते, निगलते स्वाद लेता है

भूल जाता हैं कि कभी वह गले में 

फांस बनकर अटक भी सकती है!

देवी नागरानी 

8/30/2017

Main Anjaane mein

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5/07/2014

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे


ग़ज़ल

कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे

जाने क्या था उसे गिला मुझसे

चंद साँसों की देके मुहलत यूँ

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे

क्या लकीरों की कोई साज़िश थी

रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे

जो भरोसे को मेरे छलता है

वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे

शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो

कह गई अपना हर गिला मुझसे

ऐब मेरे गिना दिये जिसने

दोस्त बनकर गले मिला मुझसे

जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको

ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे

1/08/2014

किस बात का डर

आँखें बंद है मेरी 
तीरगी से लिपटा हुआ मेरा यह मन,
गहरे बहुत, गहरे धंसता चला जाता है 
अपने ही भीतर की खाइयों में, 
आखिर थक हार कर जब, 
मैं बेबसी में खुद को छोड़ देती हूँ, 
तब लगता है मुझे मैं रोशनी से घिर जाती हूँ , 
फिर मुझे डर नहीं लगता 
न जाने किस बात का डर पाल लिया था मैंने 
खुद से भी कोई डरता है क्या? 
अब मुझे डर नहीं लगता । 

 देवी नागरानी

12/19/2013

बेजुबान चीखें

“दिल धड़क उठा, तब

जब,

दिल दहलाती चीख गूंज उठी

यहीं कहीं, आस-पास

अपने ही भीतर, और

बेसदा सी वह आवाज़

घुटती रही, घुटती रही

पर

मैं कुछ न कर सकी !

“दिल सिसक उठा, तब 

जब, जाना

काले बादलों की क़बा भी

उसकी अंग-रक्षक न बन पाई

बेनाम, बेनंग आदम हमशरीक़ रहे

उस गुनाह में

जिसकी सज़ा आज

मानवता के सर पर

तलवार बन कर लटक रही है

बाखुदा! उस सज़ा में

नारी का रुआं रुआं हाज़िरी भर रहा है

आज भी, अभी भी, इस पल भी

पर कोई कुछ नहीं कर रहा!!

“दिल रोता है

जब आँखें देखती हैं

बेधड़क, बेझिझक घूमती बेहयाई

दिशाहीन वे दरिंदे, साज़िशी गिद्ध बनकर

पाकीज़गी को चीर-फाड़ रहे हैं।

जख्मी जिस्म से निकलती

तेज़ नुकीली चीखें

इन्सानियत की ख़ला में

अपने लाचार पंजे गाढ़ रही है

इस उम्मीद में, हाँ इस उम्मीद में, कि 

कोई तो एक होगा

मानवता का अंगरक्षक

जो इन लाखों आवाज़ों के बीच

सुनकर दिल दहलाती वह चीख 

एक उजड़ती ज़िंदगी को बचा पाये।

पर हर आस

बेआस होकर लौट रही है 

और

कोई कुछ नहीं कर पा रहा है!

आज भी चीखें

लटक रही हैं फ़ज़ाओं में

आज भी कासा-ए-बदन

भिखारी की तरह                                                                         
मांग रहा है

अपने ही भाई-बेटों से

अपनी बेलिबास क़ज़ा के लिए

एक लजा का कफ़न !

इस आस में, कि शायद

कोई कुछ कर सके!!