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8/29/2011

कुछ न कह कर भी सब कहा


ग़ज़ल


कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे

जाने क्या था उसे गिला मुझसे

चंद साँसों की देके मुहलत यूँ

ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे

क्या लकीरों की कोई साज़िश थी

रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे

जो भरोसे को मेरे छलता है

वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे

शोर ख़ामुशी का न अभ पूछो

कह गई अपना हर गिला मुझसे

ऐब मेरे गिना दिये जिसने

दोस्त बनकर गले मिला मुझसे

जिसने रक्खा था क़ैद में मुझको

ख़ुद रिहाई क्यों चाहता मुझसे

हमने पाया तो बहुत कम है



ग़ज़लः
हमने पाया तो बहुत कम है, बहुत खोया है

दिल हमारा लबे-दरिया पे बहुत रोया है

कुछ न कुछ टूट के जुड़ता है यहाँ तो यारो

हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

अर्सा लगता है जिसे पाने में वो पल में खोया

बीज अफसोस का सहरा में बहुत बोया है

तेरी यादों के मिले साए बहुत शीतल से

उनके अहसास से तन-मन को बहुत धोया है

होके बेदार वो देखे तो सवेरे का समां

जागने का है ये मौसम वो बहुत सोया है

बेकरारी को लिये शब से सहर तक ये दिल

आतिशे-वस्ल में तड़पा है, बहुत रोया है

इम्तहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिये हैं ‘देवी’

उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है

देवी नागरानी

मेरी पोती निकिता नागरानी

मेरे बचपन का अक्स

गुड़िया रानी, गुड़िया रानी

तू क्यों भई उदास

बन संवर कर आज है जाना

तुझे पिया के पास

देवी नागरानी


8/28/2011

मताये कुव्वते ईमान

गज़लः

मताये कुव्वते ईमान का जोया कहाँ हूँ मैं

तहज्जुद की नमाजौं में अभी रोया कहाँ हूँ मैं

शजर एक सायादार उग आये जिस के खुश्क सीने से

अभी वो बीज मिटटी में तेरी बोया कहाँ हूँ मैं

तुम्हारे ख्वाब और ताबीर मेरी कोई तुक भी है

अरे बेदार मग्जो!! उम्र भर सोया कहाँ हूँ मैं

अभी कुछ शर्मसारी हो अभी कुछ अश्क बहने दो

जो दाग उभरे हैं दामन पर उन्हें धोया कहाँ हूँ मैं

तेरी आँखौं से आँसु के बजाये खून जारी हो

कहानी दुःख भरी सुन कर अभी रोया कहाँ हूँ मैं

पहाडौं ने जिसे धोने से माजूरी जताई थी

अभी तक सर पे अपने बोझ वो धोया कहाँ हूँ मैं

मेरी चीखौं को सब नगमा समझ कर दाद देते हैं

अज़ीज़ इस शहरे बेएहसास में खोया कहाँ हूँ मैं

शायरः अज़ीज़ बेलगामी

गायकः गुलोकार रफ़ीक़ शेख़

8/27/2011

मेरा अँत

मेरा अंत

मेरे आगे

हर पल प्रत्यक्ष होकर

मेरा मार्गदर्शक बनता है

खुली आँखों से मैं

उस सच को देखती हूँ

पर मंदबुधि की आंख

देख कर भी अनदेखा करती है

जानती है, पर

पहचानने से इनकार करती है

और, इसी तरह ज़िन्दगी का सूरज

सुबह का सफ़र तय करके

मेरे सर का साया बनकर

उसी ज़िन्दगी की ढलान से

ढलता हुआ नीचे उतर आता है

और मैं रोज़

यह दृश्य खुली आंख से देखती हूँ

फिर भी

खोई खोई सी रहती हूँ

शायद सच को पहचानने के प्रयास में!

देवी नागरानी

पहचान

हमारा वजूद इतिहास में दर्ज है

और होगा

हमारा आज

आने वाले कल के लिए

इतिहास का एक बीता हुआ पल ही सही

पर पन्नों में एक सुफ़्आ बना रहेगा.

देवी नागरानी

खोजा है एक सत्य

एकांत की गहराइयों में

डूबकर खोया एक सत्य

जो ज़ाहिर करता है-हमारे वजूद का बिछड़ना

अपने आप से जुदा होने की वेदना

उसकी छटपटाहट

एक खालीपन में खोकर

खुद को पाने की तलाश

ता-उम्र की तड़प !!

देवी नागरानी