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8/28/2011

मताये कुव्वते ईमान

गज़लः

मताये कुव्वते ईमान का जोया कहाँ हूँ मैं

तहज्जुद की नमाजौं में अभी रोया कहाँ हूँ मैं

शजर एक सायादार उग आये जिस के खुश्क सीने से

अभी वो बीज मिटटी में तेरी बोया कहाँ हूँ मैं

तुम्हारे ख्वाब और ताबीर मेरी कोई तुक भी है

अरे बेदार मग्जो!! उम्र भर सोया कहाँ हूँ मैं

अभी कुछ शर्मसारी हो अभी कुछ अश्क बहने दो

जो दाग उभरे हैं दामन पर उन्हें धोया कहाँ हूँ मैं

तेरी आँखौं से आँसु के बजाये खून जारी हो

कहानी दुःख भरी सुन कर अभी रोया कहाँ हूँ मैं

पहाडौं ने जिसे धोने से माजूरी जताई थी

अभी तक सर पे अपने बोझ वो धोया कहाँ हूँ मैं

मेरी चीखौं को सब नगमा समझ कर दाद देते हैं

अज़ीज़ इस शहरे बेएहसास में खोया कहाँ हूँ मैं

शायरः अज़ीज़ बेलगामी

गायकः गुलोकार रफ़ीक़ शेख़

8/27/2011

मेरा अँत

मेरा अंत

मेरे आगे

हर पल प्रत्यक्ष होकर

मेरा मार्गदर्शक बनता है

खुली आँखों से मैं

उस सच को देखती हूँ

पर मंदबुधि की आंख

देख कर भी अनदेखा करती है

जानती है, पर

पहचानने से इनकार करती है

और, इसी तरह ज़िन्दगी का सूरज

सुबह का सफ़र तय करके

मेरे सर का साया बनकर

उसी ज़िन्दगी की ढलान से

ढलता हुआ नीचे उतर आता है

और मैं रोज़

यह दृश्य खुली आंख से देखती हूँ

फिर भी

खोई खोई सी रहती हूँ

शायद सच को पहचानने के प्रयास में!

देवी नागरानी

पहचान

हमारा वजूद इतिहास में दर्ज है

और होगा

हमारा आज

आने वाले कल के लिए

इतिहास का एक बीता हुआ पल ही सही

पर पन्नों में एक सुफ़्आ बना रहेगा.

देवी नागरानी

खोजा है एक सत्य

एकांत की गहराइयों में

डूबकर खोया एक सत्य

जो ज़ाहिर करता है-हमारे वजूद का बिछड़ना

अपने आप से जुदा होने की वेदना

उसकी छटपटाहट

एक खालीपन में खोकर

खुद को पाने की तलाश

ता-उम्र की तड़प !!

देवी नागरानी

ता-उम्र की तड़प

एकांत की गहराइयों में

डूबकर खोया जाना एक सत्य

जो ज़ाहिर करता है-

अपने वजूद का बिछड़ना

अपने आप से जुदा होने की वेदना

उसकी छटपटाहट

एक ख़ालीपन में खोकर

खुद को पाने की तलाश

ता-उम्र की तड़प !!

देवी नागरानी

सुधा ओम के निवास स्थान पर

PiC: Shri Madan Goyal, Devi nangrani, Meera Goyal, Sudha Om, Shashi Padha and Dr. Om
११ जूलाई २०११ रैले में सुधा ओम ढींगरा जी के निवास स्थान पार एक यादगार गोष्टी का आयोजन हुआ जिसमें भागीदारी रही नार्थ कैरोलिना के साहित्य प्रेमी जो अपने आप में एक संस्था से कतई कम न थे. अपनी रचनाओं से एक समाँ बांधने में सक्षम रहे. गोष्टी खहाने के पश्चात ७ बजे के करीब शुरू हुई और रात ११.३० के करीब संपूर्ण हुई


बिंन्दु सिंह के सफल संचालन के तहत गोष्टी का संचार हुआ.


Pic: Dr. Viajay, Shashi padha, Sudha Om, Dr. Om, Bindu Singh, Devi Nangrani
सुधा ओम ढींगरा, शशि पाधा, केशव पाधा, देवी नागरानी, मीरा गोयल, मदन गोयल, बिंन्दु सिंह, आदिति मजुमदार, रमेश शोणक, तोषी शोणक, सरदार सिहं , महिन्दर सिहं , उषा देव, जाफ़र अब्बास, विजया जी, फ़रहाना, श्री दास, श्रीमती दास. प्रो॰ बिजय दाश व उनकी धर्मपत्नी की भागीदारी रही. अंत में सुछाजी ने सब का धन्यवाद अता किया.


एक खत ख़ुद के नाम

प्रिय देवी,

आज वक़्त की शाख़ से टूटकर एक लम्हां

मेरी याद के आँगन में आकर ठहरा है

कुछ सोचों का सिलसिला चलता रहा

फिर जाने कब वो कहाँ टूटता रहा,

और साथ उसके क्या क्या टूटा

क्या बताऊँ मैं तुम्हें?

इन्सान की फितरत बदली

साथ उसके बँट गए आँगन

दीवार बन गई रिश्तों के बीच में,

अँह की गर्दन तन गई,

इन्सानियत को खा गई इन्सान की हवस

सर्द हो गई प्यार की बाती

सन्नाटों की सल्तनत बाकी रही

जहाँ ठँडी छाँव को आदमी तरस रहे हैं.

तन तो खिज़ाओं की थपेड़ों से झड़ रहे हैं..

आगे और क्या लिखूँ? मन भर आया है

बस यादों के दीपक असुवन में झिलमिला रहे हैं,

बुझती हुई साँसों ने आज फिर चोट खाई है

इन यादों के आँगन में, जहाँ ठहरा हुआ वह पल

मेरे अस्तित्व को पुकार रहा है,

जाने कब मिलना हो?

तब तक,

तेरी परछाई

॥ जिसे वक्त की आँधी उड़ाकर फिर से आँगन में ले आई॥

देवी नागरानी