यक़ीन की डोर पकड़ कर
मेरे इस मासूम से मन को
आस का दामन छूने की तमन्ना
अब तक है,
सामने सूरज की रौशनी
आस की लौ बनकर
जगमगा रही है
पर, जाने क्यों?
ज़िंदगी की दल-दल में
विवशता धँसती ही जा रही है
मेरी मुफ़लिसी की,
मेरी अपंगता की
जो मेरी अक्षमताओं का
प्रद्रशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ती
पर सांसें निराशा का दामन
छोड़ कर, आज भी
जीवन का हाथ थाम रही है
शायद उन्हें अपना मूल्य कथने की
आज़ादी है.
मेरे इस मासूम से मन को
आस का दामन छूने की तमन्ना
अब तक है,
सामने सूरज की रौशनी
आस की लौ बनकर
जगमगा रही है
पर, जाने क्यों?
ज़िंदगी की दल-दल में
विवशता धँसती ही जा रही है
मेरी मुफ़लिसी की,
मेरी अपंगता की
जो मेरी अक्षमताओं का
प्रद्रशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ती
पर सांसें निराशा का दामन
छोड़ कर, आज भी
जीवन का हाथ थाम रही है
शायद उन्हें अपना मूल्य कथने की
आज़ादी है.