Pages

4/01/2026

मेरी यादों का आकाश

मेरी यादों के आकाश तले

दबी हुई है मेरे ज़मीर की धरती

थक चुकी है, बोझ उठाकर

अपने जेहन के आँचल पर

झीनी चुनरिया जिसकी

तार-तार हुई है

उन दरिंदों के शिकंजों से

उन खूंखार नुकीली नज़रों से, जो

शराफ़त का दावा तो करते हैं, पर

दुश्वारियों को खरीदने का

सामान भी रखते हैं।

बिक रहा है ज़मीर यहाँ

बस बची है अंगारों के नीचे

दबी हुई कुछ राख़ मेरे

ज़िन्दा जज़्बों की

जो धाँय धाँय उड़कर

काला स्याह कर रही है

मेरे यादों के आकाश को


 

माँ ने कहा था

मैं गाड़ी के नीचे आते आते

बच गई थी!

तब मैं छोटी थी....

और

माँ ने यह भी कहा था

आने वाले कल में

ऐसे कई हादसों से

मैं खुद को बचा लूँगी

जब मैं बड़ी हो जाऊँगी.....

पर

कहाँ बचा पाई मैं खुद को

उस हादसे से?

दानवता के उस षड्यंत्र से?

जिसने छल से

मेरे तन को, मेरे मन को

समझकर एक खिलौना

खेलकर, तोड़-मरोड़ उसे -

फेंक दिया वहाँ,

जहाँ कोई रद्दी भी नहीं फेंकता!

उफ़!

बीमार मानसिकता का शिकार

वह खुद भी,

ज़िन्दा रहने का सबब ढूँढता है!

सच तो यह है

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं होता!

 

याद आया

माँ ने ये भी कहा था

वह मर चुका होता है...

जिसका ज़मीर ज़िन्दा नहीं होता !