मेरी यादों के आकाश तले
दबी हुई है मेरे ज़मीर की धरती
थक चुकी है, बोझ उठाकर
अपने जेहन के आँचल पर
झीनी चुनरिया जिसकी
तार-तार हुई है
उन दरिंदों के शिकंजों से
उन खूंखार नुकीली नज़रों से, जो
शराफ़त का दावा तो करते हैं, पर
दुश्वारियों को खरीदने का
सामान भी रखते हैं।
बिक रहा है ज़मीर यहाँ
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख़ मेरे
ज़िन्दा जज़्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह कर रही है
मेरे यादों के आकाश को
1 comment:
ओह्ह आक्रोश और दर्द में भींगी बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
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