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3/31/2026

खुद से अनजान

 



जब
तक खुद से मिली थी।

अनजान थी!

एक नहीं, अनेक सच्चाइयों से

जिन्हें मैं अपने ही कफ़स से ढकती रही

गंधारी की तरह खुली आंखों पर

पट्टी बांधकर

हर सच्चाई को टटोलते हुए

नकारती रही.

क्या कभी देखा अनदेखा एक हो सकता है?

जुर्म और सज़ा को एक तराजू में तोला जा सकता है?

नहीं ना?

तो फिर क्यों सवाल किया?

मन ने युधिष्ठिर की तरह

कि सौ जनम तक कोई गुनाह नहीं हुआ है मुझसे

फिर क्यों यह बीनाई मेरे हिस्से में आई?

कृष्ण ने कहा था:

नियति टल नहीं सकती

किसी की भी नहीं!

जन्मों का कर्ज एक जनम में तो

उतरने वाला नहीं

यह मानव जनम बड़ा ही मुश्किल

मंद बुद्धि के कारण

समझ पाना मुश्किल

पर अपना ही बोया हुआ

खुद की काटना पड़ता है।

यह तय है।

बस मानना है,

स्वीकारना है,

बिना किसी दलील के

यही बेबसी का अंतिम चरण

नियति बन जाता है।

 

 








 


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