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8/27/2011

मेरा अँत

मेरा अंत

मेरे आगे

हर पल प्रत्यक्ष होकर

मेरा मार्गदर्शक बनता है

खुली आँखों से मैं

उस सच को देखती हूँ

पर मंदबुधि की आंख

देख कर भी अनदेखा करती है

जानती है, पर

पहचानने से इनकार करती है

और, इसी तरह ज़िन्दगी का सूरज

सुबह का सफ़र तय करके

मेरे सर का साया बनकर

उसी ज़िन्दगी की ढलान से

ढलता हुआ नीचे उतर आता है

और मैं रोज़

यह दृश्य खुली आंख से देखती हूँ

फिर भी

खोई खोई सी रहती हूँ

शायद सच को पहचानने के प्रयास में!

देवी नागरानी

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