जीवन के तट पर-मेरे मन की सइरा में सफ़र करते जब मेरे पाँव थक जाते हैं तब कलम का सहारा ले कर शबनमी सपने बुनने लगती हूँ. प्यास की आस बंध जाती है,
सफर बाकी कुछ और....
सिर्फ थोड़ा और.....
जीवन के तट पर-मेरे मन की सइरा में सफ़र करते जब मेरे पाँव थक जाते हैं तब कलम का सहारा ले कर शबनमी सपने बुनने लगती हूँ. प्यास की आस बंध जाती है,
सफर बाकी कुछ और....
सिर्फ थोड़ा और.....
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2/17/2011
एक मुर्गा चश्मे दीदम
एक मुर्गा चश्मे दीदम
चलते चलते थक गया
लाओ चाकू काटो गर्दन
फिर भी वो चलने लगा
कलमकारःस्तुति शर्मा
achhi lagi badhai
ReplyDeletebahut badhiya .stuti ki tarah hi pyari .
ReplyDeleteअच्छी प्रस्तुति !
ReplyDeleteAap sabhi ka hriday se dhanyawwad is baal kavita ko padha aur saraha
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