मेरा मन एक रेतीला कण !
एक अनबुझी प्यास लेकर
बार-बार उस एक बूंद की तलाश में,
जैसे पपीहे को बरसात की वो पहली बूंद
वक्त के इंतज़ार के बाद मिली
और तिश्नगी को त्रप्त कर गई.
वैसे ही मेरा मन
हं! मेरा प्यासा मन
उसी अंतरघट के तट पर
कई बार इसी प्यास को बुझाने
अद्रश्य धारा की तलाश में
अनंत काल से भटक रहा है.
देवी नागरानी
एक अनबुझी प्यास लेकर
बार-बार उस एक बूंद की तलाश में,
जैसे पपीहे को बरसात की वो पहली बूंद
वक्त के इंतज़ार के बाद मिली
और तिश्नगी को त्रप्त कर गई.
वैसे ही मेरा मन
हं! मेरा प्यासा मन
उसी अंतरघट के तट पर
कई बार इसी प्यास को बुझाने
अद्रश्य धारा की तलाश में
अनंत काल से भटक रहा है.
देवी नागरानी
उसी अंतरघट के तट पर
ReplyDeleteकई बार इसी प्यास को बुझाने
अद्रश्य धारा की तलाश में
अनंत काल से भटक रहा
और यही भटकन ज़िंदगी भर चलती रहती है ...बहुत सुन्दर रचना
बहुत गहन चिंतन से परिपूर्ण सुन्दर रचना..
ReplyDeletebehad sunder.
ReplyDeleteचर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
ReplyDeleteको ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच
पानी बीच मीन पियासी सी अनुभूति हुई , इस रचना को पढ़ कर !
ReplyDelete्यही भटकाव ही तो प्यास बढाता रहता है………सुन्दर भावाव्यक्ति।
ReplyDeleteमेरा मन एक रेतीला कण !
ReplyDeleteक्या बात है, बहुत सुंदर
अंतर्मन के एहसास को बखूबी पिरोया है
ReplyDeleteमित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
ReplyDeleteआओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
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बुधवारीय चर्चा मंच ।